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Tuesday, March 3, 2026
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“एक तानाशाह को यूनिवर्सिटी के चांसलर के पद पर नहीं रहना चाहिए…”, जब इंदिरा के सामने येचुरी ने भरी थी हुंकार

1977 में आपातकाल के बाद भी इंदिरा गांधी JNU की चांसलर पद पर मौजूद थीं। तब सीताराम येचुरी ने उनका जबरदस्त विरोध किया था। उन्होंने इंदिरा गांधी के सामने अपना ज्ञापन पढ़ा था।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। साल था 1977। आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को करारी हार मिली थी। इंदिरा गांधी के बाद मोरारजी देसाई देश की कमान संभाल रहे थे। आजादी के बाद यह पहली बार था जब कोई गैर कांग्रेसी देश का प्रधानमंत्री बना हो। लोकसभा चुनाव में करारी हार मिलने के बावजूद इंदिरा गांधी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलाधिपति बनी हुई थीं। जिसका जेएनयू में भयानक विरोध हो रहा था। इस विरोध का नेतृत्व कर रहे थे सीताराम येचुरी। दरअसल सीताराम येचुरी उस समय JNU छात्रसंघ के अध्यक्ष थे और वो अर्थशास्त्र के छात्र भी थे। इंदिरा गांधी के द्वारा देश में आपातकाल लगाए जाने पर जेएनयू के छात्र काफी भड़के हुए थे। वो उन्हें तानाशाह जैसे शब्दों से नवाज रहे थे। छात्रों का कहना था कि उन्हें ये कत्तई पसंद नहीं है कि कोई तानाशाह उनका चांसलर हो।

सीताराम येचुरी ने सैकड़ों छात्रों के साथ किया था पैदल मार्च

इंदिरा गांधी के विरोध में जेएनयू के छात्र लामबंद हो रहे थे। वो उनपर लगातार चांसलर का पद छोड़ने का दबाव बना रहे थे, लेकिन इंदिरा गांधी पद छोड़ने को तैयार नहीं थी। तब उस समय के JNU अध्यक्ष सीताराम येचुरी ने सैकड़ों छात्रों को लेकर इंदिरा गांधी के आवास तक पैदल मार्च किया। छात्र लगातार इंदिरा गांधी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए जेएनयू कुलाधिपति का पद छोड़ने को कह रहे थे। 

इंदिरा गांधी के सामने पढ़ा उनके विरोध में दिया जाने वाला ज्ञापन

छात्र काफी देर तक इंदिरा गांधी के आवास के बाहर प्रदर्शन करते रहे। जब इंदिरा गांधी को लगा कि ये छात्र यहां से जाने वाले नहीं हैं तो वो अपने आवास से बाहर आईं और छात्रों से मुखातिब हुईं। इसी दौरान सीताराम येचुरी ने अपना एक ऐतिहासिक ज्ञापन पढ़ा। जिसमें उन्होंने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग की थी। जब सीताराम ज्ञापन पढ़ रहे थे, तब उनके बगल में खड़ी होकर इंदिरा गांधी मुस्कुराती रहीं। इस घटना के बाद इंदिरा गांधी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि इस घटना के बाद सीताराम येचुरी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

क्या लिखा था ज्ञापन में?

सीताराम येचुरी ने अपने ज्ञापन में लिखा था कि”एक तानाशाह को यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति के पद पर नहीं रहना चाहिए। उन्हें तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। सीताराम येचुरी ने इमरजेंसी के दौरान जेएनयू में इंदिरा गांधी के होने वाले कार्यक्रम का भी विरोध किया था। उस दौरान इंदिरा गांधी जेएनयू कैंपस में एक कार्यक्रम करना चाहती थीं, लेकिन छात्रों के विरोध के चलते उनका कार्यक्रम नहीं हो पाया था।”

ये ख्वाब रह गया अधूरा

इस घटना के बाद सीताराम येचुरी मीडिया में काफी मशहूर हो गए। वो राष्ट्रीय स्तर पर एक छात्रनेता बनकर उभरे। वो 1977 से 78 तक JNU छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे। इसके बाद वो मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी की छात्र इकाई SFI के संयुक्त सचिव बनाए गए। सीताराम येचुरी अर्थशास्त्र में PHD करना चाहते थे, हालांकि राजनीति में काफी आगे बढ़ जाने के चलते उनका ये सपना पूरा नहीं हो सका। जब 2004 में मनमोहन सिंह की केंद्र में सरकार बनी, तब उस समय सरकार बनाने में सीताराम येचुरी ने अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि आज सीताराम येचुरी का दिल्ली के AIIMS में देहांत हो गया है। येचुरी ने अपने जीवनकाल में काफी कुछ हासिल किया, लेकिन उनके मन में एक मलाल रह गया और वो था अर्थशास्त्र में उनका PHD का पूरा नहीं होना।

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