नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। महाप्रभु जगन्नाथ की ऐतिहासिक रथ यात्रा के दौरान इस साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचे। लेकिन रथ खींचने के दौरान अव्यवस्था के चलते 600 से ज्यादा श्रद्धालुओं को चोटें आईं और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। राहत की बात रही कि कोई जनहानि नहीं हुई।
भगवान बलभद्र का रथ मोड़ पर अटका, बढ़ी भीड़
रथ यात्रा के मार्ग में एक मोड़ पर भगवान बलभद्र का रथ (तालध्वज) फंस गया, जिससे रथ खींचने की गति धीमी हो गई। इस कारण रथ के आसपास भीड़ जमा होती चली गई। लोग रथ को करीब से देखने और छूने के प्रयास में प्रतिबंधित क्षेत्र में घुस गए, जिससे और अव्यवस्था फैल गई। ओडिशा के मंत्री मुकेश महालिंग ने कहा कि अधिकांश श्रद्धालु गर्मी और उमस के कारण बीमार हुए। उन्होंने बताया कि मंदिर परिसर और आसपास प्राथमिक चिकित्सा केंद्र (PHC) बनाए गए हैं, जहां पर तुरंत पानी, ग्लूकोज और इलाज की व्यवस्था की गई है।
10,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात
इतनी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए 10,000 से ज्यादा पुलिस और सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। साथ ही CAPF की 8 कंपनियां, और 275 एआई-सक्षम सीसीटीवी कैमरे पूरे रथ मार्ग की निगरानी कर रहे हैं। ओडिशा के DGP वाई. बी. खुरानिया ने कहा कि हर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
रथ खींचने की परंपरा और धार्मिक उल्लास
हर साल की तरह इस बार भी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों को पुरी मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक खींचा गया। भगवान बलभद्र का रथ: तालध्वज देवी सुभद्रा का रथ: दर्पदलन भगवान जगन्नाथ का रथ: नंदी घोष तीनों रथों को सिंह द्वार से भक्तों ने परंपरागत अनुष्ठानों के बाद खींचना शुरू किया। सबसे पहले चक्रराज सुदर्शन को देवी सुभद्रा के रथ पर विराजमान किया गया। फिर क्रमशः भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को रथ पर चढ़ाया गया। अंत में भगवान जगन्नाथ की ‘छेरा पहनरा’ रस्म के बाद उनका रथ खींचा गया। पुरी के गुंडिचा मंदिर को त्रिदेवों की मौसी का घर माना जाता है। रथ यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा वहां एक सप्ताह ठहरते हैं। फिर उन्हें ‘बहुदा यात्रा’ में वापस जगन्नाथ मंदिर लाया जाता है।
श्रद्धा और सुरक्षा दोनों की रही परीक्षा
इस साल का रथ उत्सव एक बार फिर यह साबित कर गया कि आस्था की भीड़ को संभालना आसान नहीं होता। हालांकि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की तत्परता के कारण कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई, लेकिन आगे के लिए भीड़ प्रबंधन को लेकर कई सबक मिले हैं। पुरी की रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव और आस्था का महासागर है। इस बार भी भक्तों ने भारी उमस और भीड़ के बावजूद भगवान जगन्नाथ के दर्शन की ललक में हर कठिनाई को सहन किया। उम्मीद है कि आने वाले सालों में यह आयोजन और ज्यादा सुरक्षित और सुव्यवस्थित तरीके से हो।





