नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। सनातन धर्म में भगवान परशुराम जयंती का विशेष महत्व है। भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जानेवाले और भगवान शिव के परम भक्त परशुराम का आज के दिन माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि के घर प्रदोष काल में उनका जन्म हुआ था। चिरंजीवी कहे जानेवाले भगवान परशुराम अपने माता-पिता के आज्ञाकारी पुत्र थे। लेकिन ऐसा क्या हुआ जो उन्होनें बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी माता का वध कर दिया था आइए जानते है वो पूरी घटना के बारे में।
ऋषि जमदग्नि ने अपने पुत्रों को रेणुका देवी के वध का आदेश दिया
पौराणिक कथा अनुसार, एक दिन परशुराम की माता रेणुका देवी सरोवर में नहाने गई, उसी समय संयोगवश, वहां राजा चित्ररथ नौका विहार कर रहे थे। जिन्हें देखकर रेणुका देवी के मन में कुछ देर के लिए उस राजा के प्रति विकार उत्पन्न हो गया। जब वे वापस आश्रम लौटीं, तो ऋषि जमदग्नि यानी परशुराम के पिता ने उनके मन में आए भावों को जान लिया और अत्यंत क्रोधित हो उठे। गुस्से में आकर ऋषि जमदग्नि ने अपने पुत्रों को रेणुका देवी के वध का आदेश दिया लेकिन माता के मोह में बड़े पुत्र ने इंकार कर दिया । वहीं अन्य पुत्रों को भी आदेश दिया लेकिन उन्होनें भी ऐसा करने से इंन्कार कर दिया आखिरकार उन्होनें अपने छोटे पुत्र यानी परशुराम को आज्ञा दी कि माता का सिर काट दो और बेटे ने अपने पिता के आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता का वध कर दिया।
परशुराम से खुश होकर पिता ने दिया ये वरदान
पिता के आदेश को ना माननेवाले पुत्रों को ऋषि ने विवेकहीनता का श्राप दे दिया, वहीं परशुराम के आज्ञापालन से खुश होकर ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को वरदान मांगने को कहा। जिसपर परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने का वर मांगा। जिसे ऋषि द्वारा तुरंत स्वीकार करते हुए रेणुका देवी को जीवित कर नया जीवन दे दिया।
शिव तपस्या और ‘परशु’ प्राप्ति
ऋषि जमदग्नि ने अपने पुत्र परशुराम को उनकी आज्ञा और निष्ठा को देखते हुए उन्हें समस्त शास्त्रों और शस्त्रों का ज्ञाता बना दिया। चूंकि, माता का वध करने के चलते परशुराम को मातृहत्या पाप को दोष लगा, जिसका प्रायश्चित करने उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पापमुक्त का आर्शिवाद दिया और साथ ही उन्हें ‘परशु’ नामक अस्त्र प्रदान किया जिसके कारण वे देवी देवाताओं व मनुष्यों के बीच परशुराम कहलाएं गए।





