नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। 13 दिसंबर 2001 की सुबह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे बड़े प्रतीक भारतीय संसद पर आतंकियों ने हमला किया। पांच आतंकवादी संसद परिसर में घुस आए और अंधाधुंध गोलीबारी की। इस हमले में 9 लोग शहीद हुए, जिनमें सुरक्षा कर्मी और संसद कर्मचारी शामिल थे। बहादुर जवानों ने आतंकियों को संसद में घुसने से पहले ही मार गिराया, लेकिन इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया। भारत सरकार ने इस हमले के पीछे पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को जिम्मेदार ठहराया। देश में गुस्सा था और लग रहा था कि अब पाकिस्तान को करारा जवाब मिलेगा।
करगिल, कंधार और फिर संसद हमला
संसद हमला कोई अकेली घटना नहीं थी। 1999 में करगिल युद्ध कंधार विमान अपहरण और फिर संसद पर आतंकी हमला लगातार हमलों से भारत का सब्र टूट चुका था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने बड़ा कदम उठाने का फैसला किया। ऑपरेशन पराक्रम: युद्ध की दहलीज पर भारत संसद हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन पराक्रम शुरू किया। करीब 5 से 8 लाख भारतीय सैनिक सीमा पर तैनात किए गए पाकिस्तान ने भी लगभग 3 लाख सैनिक सामने उतार दिए यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य आमना-सामना माना गया। नौ महीने तक दोनों देशों की सेनाएं युद्ध के लिए तैयार रहीं, लेकिन आखिरकार भारत को बिना लड़े ही सैनिक वापस बुलाने पड़े।
सवाल जो आज भी परेशान करता है
इतनी बड़ी तैयारी के बाद भी भारत ने हमला क्यों नहीं किया? क्या सरकार दुविधा में थी? क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव था? या फिर परमाणु युद्ध का डर? सरकार के भीतर मतभेद कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की कई बैठकें हुईं। राजनीतिक नेतृत्व सीमित कार्रवाई चाहता था सेना पूरी तैयारी और स्पष्ट लक्ष्य की मांग कर रही थी पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल सुशील कुमार के अनुसार, सरकार ने कभी साफ नहीं बताया कि क्या लक्ष्य हासिल करना है कौन सा इलाका लेना है युद्ध का अंतिम उद्देश्य (End State) क्या होगा बिना स्पष्ट राजनीतिक आदेश के सेना आगे नहीं बढ़ सकती थी। सेना पूरी तरह तैयार नहीं थी वायुसेना और नौसेना 1 हफ्ते में तैयार थीं लेकिन थलसेना की स्ट्राइक कोर सीमा से काफी पीछे थीं उन्हें पूरी तरह ऑपरेशनल होने में 3 हफ्ते लगते अधूरी तैयारी के साथ युद्ध शुरू करना बहुत बड़ा जोखिम था।





