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Wednesday, March 11, 2026
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अलविदा MiG 21! 6 दशक के बाद एयर फोर्स से MiG 21 की हुुई विदाई, सेवामुक्त विमान का कहां होता है इस्‍तेमाल?

वायुसेना ने लड़ाकू विमान MiG-21 को छह दशकों की लंबी सेवा के बाद आज यानी शुक्रवार को सेवामुक्त कर दिया गया। इस अवसर पर चंडीगढ़ में एक समारोह का आयोजित किया गया।

नई दिल्‍ली, रफ्तार डेस्‍क । भारतीय वायु सेना ने शुक्रवार को मिग-21 लड़ाकू विमानों को आधिकारिक रूप से सेवानिवृत्त कर दिया, जिससे छह दशक लंबे एक युग का अंत हो गया। 1963 में शामिल मिग-21 ने कई युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब इसकी जगह आधुनिक तेजस, राफेल और सुखोई जैसे विमान ले रहे हैं।

चंडीगढ़ स्थित भारतीय वायुसेना अड्डे पर मिग-21 की सेवामुक्ति के अवसर पर एक औपचारिक फ्लाईपास्ट और समारोह आयोजित किया जाएगा। इसमें वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और वे अनुभवी पायलट शामिल होंगे, जिन्होंने विभिन्न पीढ़ियों में इस ऐतिहासिक विमान को उड़ाया और देश की वायु सीमाओं की रक्षा की।

1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल मिग-21 देश का पहला सुपरसोनिक लड़ाकू विमान था। इसका पहला स्क्वाड्रन, चंडीगढ़ स्थित 28 स्क्वाड्रन, “फर्स्ट सुपरसोनिक्स” के नाम से जाना गया। वर्षों में भारत ने 700 से अधिक मिग-21 विमानों को सेवा में लिया, जिनमें कई HAL द्वारा देश में ही निर्मित किए गए।

करीब छह दशक की सेवा के बाद मिग-21 को भारतीय वायुसेना से औपचारिक रूप से रिटायर किया जा रहा है। रिटायरमेंट के बाद कुछ विमान संग्रहालयों में प्रदर्शित होंगे, कुछ प्रशिक्षण संस्थानों में इस्तेमाल किए जाएंगे, जबकि कई एयरबेस पर गेट गार्जियन बनकर इसकी विरासत को संरक्षित करेंगे।

आधिकारिक रूप से रिटायर होगा लड़ाकू विमान मिग-21 

भारतीय वायुसेना का दिग्गज लड़ाकू विमान मिग-21 आधिकारिक रूप से रिटायर हो गया है। जनसंपर्क अधिकारी विंग कमांडर जयदीप सिंह ने बताया कि, यह विमान 2019 के बालाकोट स्ट्राइक और 2025 के ऑपरेशन सिंदूर में शामिल रहा। छह दशक की सेवा के बाद मिग-21 ने विदाई ली।

क्‍या लड़ाकू विमानों की होगी विदाई?

जैसे इंसानों की उम्र बढ़ने पर उनकी कार्यक्षमता घटती है, वैसे ही लड़ाकू विमानों का भी एक निश्चित जीवनकाल होता है। समय के साथ एयरफ्रेम कमजोर पड़ने लगता है और विमान उड़ान के लिए सुरक्षित नहीं रहता। तकनीकी प्रगति के कारण पुराने विमान नई पीढ़ी के विमानों के सामने पिछड़ जाते हैं।

लड़ाकू विमानों को आमतौर पर तब सेवानिवृत्त किया जाता है, जब वे तकनीकी रूप से पिछड़ने लगते हैं। स्पेयर पार्ट्स की कमी, रखरखाव में आने वाली कठिनाई और बढ़ती परिचालन लागत भी उनके रिटायरमेंट के प्रमुख कारण होते हैं। जब ये लागत व्यावहारिक सीमा से ऊपर पहुंच जाती है, तो ऐसे विमान सेवा से हटा दिए जाते हैं।

हटा लिए जाएंगे स्पेयर पार्ट्स

सेवानिवृत्ति के बाद लड़ाकू विमानों की दूसरी जिंदगी शुरू होती है । लेकिन उड़ान भरने के लिए नहीं। इन्हें धीरे-धीरे खोलकर उनके कीमती एवियोनिक्स, सेंसर और जरूरी उपकरण निकाले जाते हैं। ये हिस्से या तो अन्य विमानों में नई जान फूंकते हैं या फिर सुरक्षित रूप से संग्रहित कर लिए जाते हैं, ताकि भविष्य में काम आ सकें।

सेवानिवृत्त विमानों से निकाले गए रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और कॉकपिट इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों का पुनः उपयोग सक्रिय विमानों में किया जा रहा है। इन उन्नत सिस्टम्स का पुनर्विक्रय मूल्य भी काफी अच्छा होता है, जबकि अन्य पुर्जों को संरक्षित रखकर उन्हें रखरखाव में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे उनकी उपयोगिता और सेवा अवधि दोनों बढ़ जाती हैं।

कहा रखें जाते है MIG-21 विमान

कुछ लड़ाकू विमान सौभाग्यशाली होते हैं जो संग्रहालयों और सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शनी इकाइयों के रूप में संरक्षित किए जाते हैं। ये विमान युवाओं को सशस्त्र बलों में शामिल होने की प्रेरणा देते हैं और देशभक्ति की भावना जगाते हैं।

सेवानिवृत्त विमानों को संग्रहित किया जाता है। यहाँ विमानों को या तो रखरखाव के साथ सुरक्षित रखा जाता है, या उनके पुर्जों को पुनः उपयोग या बिक्री के लिए निकाला जाता है, इसके बाद बचे हुए हिस्से कबाड़ में डाल दिए जाते हैं।

बोनयार्ड सुविधाएं आमतौर पर रेगिस्तानी क्षेत्रों में होती हैं, जहां शुष्क मौसम जंग को कम करता है और जमीन कठोर होती है। कुछ देशों में पुराने सोवियत जेट विमानों को कंक्रीट से भरकर धीरे-धीरे जमीन में धंसने दिया जाता है, ताकि वे अपने भयावह सोवियत अतीत को प्रतीकात्मक रूप से दफना सकें।

क्या इनका फिर किया जाएगा इस्‍तेमाल?

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना ने सेवानिवृत्त लड़ाकू विमानों को वायु रक्षा प्रशिक्षण हेतु रेडियो-नियंत्रित लक्ष्य विमान में बदलने की योजना लागू की। DH.82 ‘क्वीन बी’ इस प्रयोग का पहला विमान था। ये विमानों को दूरस्थ रेडियो नियंत्रण से उड़ाया जाता था, जिससे सुरक्षात्मक और वास्तविक प्रशिक्षण संभव हुआ।

बाद में डे हॅविलैंड वैम्पायर, F‑86 सेबर जैसे कुछ सेवानिवृत्त लड़ाकू विमानों को भी लक्ष्य ड्रोन में बदल दिया गया, पर ये रूपांतरण महंगा साबित हुआ। तकनीकी प्रगति के साथ सस्ते विकल्प आ गए और फ्लाई‑बाय‑वायर वाले आधुनिक विमानों का इस तरह रूपांतरण व्यावहारिक रूप से संभव नहीं रहा।

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