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Saturday, March 14, 2026
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Jaya Ekadashi 2026: इस दिन मनाई जाएगी माघ मास की अंतिम एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

माघ माह की अंतिम एकादशी यानी जया एकादशी 2026 इस वर्ष 29 जनवरी को मनाई जाएगी, जिसकी तिथि 28 जनवरी शाम से शुरू होकर 29 जनवरी दोपहर तक रहेगी।

नई दिल्‍ली / रफ्तार डेस्‍क । माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी जया एकादशी 2026 में 29 जनवरी को मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष जया एकादशी तिथि 28 जनवरी शाम 04:35 बजे से शुरू होकर 29 जनवरी दोपहर 01:55 बजे तक रहेगी, इसलिए जया एकादशी का मुख्य दिन 29 जनवरी माना जाएगा।

सभी एकादशी तिथियों में जया एकादशी को श्रेष्ठ माना गया है।

जया एकादशी को सभी एकादशी तिथियों में श्रेष्ठ माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा और नियम से करने पर व्यक्ति भूत-प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है और मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। कहा जाता है कि यह व्रत ब्रह्महत्या जैसे महापापों से भी मुक्ति दिलाने वाला है और व्यक्ति के अंदर के दोषों को समाप्त कर सद्गुणों की ओर ले जाता है।माघ मास की यह अंतिम एकादशी होने के कारण इसे विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा और तिल का भोग लगाया जाता है।

जया एकादशी 2026 का शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त: 05:25 AM – 06:18 AM

प्रातः संध्या: 05:52 AM – 07:11 AM

अभिजित मुहूर्त: 12:13 PM – 12:56 PM

विजय मुहूर्त: 02:22 PM – 03:05 PM

गोधूलि मुहूर्त: 05:55 PM – 06:22 PM

सायाह्न संध्या: 05:58 PM – 07:17 PM

अमृत काल: 09:26 PM – 10:54 PM

निशिता मुहूर्त: 12:08 AM (30 जनवरी) – 01:01 AM (30 जनवरी)

रवि योग: 07:11 AM – 07:31 AM

जया एकादशी पूजा विधि

जया एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत संकल्प लें। घर के मंदिर में लाल कपड़े से चौकी सजाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। एक लोटे में गंगाजल लेकर उसमें तिल, रोली और अक्षत मिलाकर जल की कुछ बूंदें भगवान पर छिड़कें और फिर उसी जल से घट स्थापना करें।

इसके बाद धूप-दीप जलाकर फूल चढ़ाएं और भगवान की आरती करें। इस दिन तिल का भोग अत्यंत शुभ माना जाता है, साथ ही तुलसी का प्रयोग भी अवश्य करें। पूजा के बाद जरूरतमंदों को दान दें। शाम को पुनः भगवान विष्णु की पूजा करें और फलाहार ग्रहण करें। अगले दिन सुबह किसी ब्राह्मण को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें, उसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें।

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