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गीता ने हमें ऊर्जा, साहस, एकता और आध्यात्मिक चेतना दी: नरेन्द्र मोदी

नई दिल्ली, 09 मार्च (हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीमद्भागवत गीता के संदेश को भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ते हुए कहा कि अधिकारों के साथ हमें अपने कर्तव्यों पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। कुछ लोग भारत की लोकतांत्रिक संस्थानों की गरिमा और उसकी विश्वसनीयता को चोट पहुंचा रहे हैं। लेकिन यह संतोष की बात है कि ऐसे लोग मुख्यधारा का हिस्सा नहीं हैं। श्रीमद्भगवत गीता ने हमें ऊर्जा, साहस, एकता और आध्यात्मिक चेतना दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को अपने आवास लोक कल्याण मार्ग पर श्रीमद्भगवत गीता के श्लोकों पर 21 विद्वानों की व्याख्याओं के साथ पांडुलिपि के 11 खण्डों का विमोचन किया। इस अवसर पर जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और धर्मार्थ न्यास के ट्रस्टी डॉ. करण सिंह भी उपस्थित थे। प्रधानमंत्री ने श्रीमद्भगवत गीता को महाभारत से लेकर आजादी की लड़ाई तक भारत का पथ-प्रदर्शक बताया। उन्होंने कहा कि इसने हमें ऊर्जा, साहस, एकता और आध्यात्मिक चेतना दी है। गीता का कर्मयोग हमें गांव, गरीब और वंचितों की सेवा सिखाती है। यही गीता हमें कोरोना कालखंड में विश्व की निस्वार्थ भाव से मदद की भी प्रेरणा देती है। श्रीमद्भगवत गीता की विविध व्याख्याओं को वैचारिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके श्लोकों की अलग-अलग विद्वानों ने कई तरह से व्याख्या की है। इसी संदर्भ में आगे उन्होंने कहा, “भारत को एकता के सूत्र में बांधने वाले आदि शंकराचार्य ने गीता को आध्यात्मिक चेतना के रूप में देखा। गीता को रामानुजाचार्य जैसे संतों ने आध्यात्मिक ज्ञान की अभिव्यक्ति के रूप में सामने रखा। स्वामी विवेकानंद के लिए गीता अटूट कर्मनिष्ठा और अदम्य आत्मविश्वास का स्रोत रही है। आगे उन्होंने कहा कि गीता श्रीअरबिंदो के लिए तो ज्ञान और मानवता की साक्षात अवतार थी। गीता महात्मा गांधी की कठिन से कठिन समय में पथ-प्रदर्शक रही है। गीता नेताजी सुभाषचंद्र बोस की राष्ट्रभक्ति और पराक्रम की प्रेरणा रही है। यह गीता ही है, जिसकी व्याख्या बाल गंगाधर तिलक ने की और आजादी की लड़ाई को नई ताकत दी। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि गीता को ज्ञान, कर्म, आध्यात्म, भक्ति, पराक्रम और योग से जोड़ा गया है। यह बताता है कि भारत में सदियों पहले भी लोगों को अपने विचारों को रखने की स्वतंत्रा थी। उन्होंने कहा, “किसी एक ग्रंथ के हर श्लोक पर अलग-अलग व्याख्याएं, इतने मनीषियों की अभिव्यक्ति, यह गीता की उस गहराई का प्रतीक है, जिस पर हजारों विद्वानों ने अपना पूरा जीवन दिया है। यह भारत की उस वैचारिक स्वतंत्रता का भी प्रतीक है, जो हर व्यक्ति को अपने विचार रखने के लिए प्रेरित करती है।” प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आजादी के 75 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। ऐसे में हमें युवा पीढ़ी को बताना चाहिए कि गीता ने कैसे उस समय के संघर्ष को ऊर्जा प्रदान की। उन्होंने कहा, “हम सभी को गीता के इस पक्ष को देश के सामने रखने का प्रयास करना चाहिए। कैसे गीता ने हमारी आजादी की लड़ाई को ऊर्जा देने का कार्य किया। कैसे गीता ने देश को एकता के आध्यात्मिक सूत्र में बांधकर रखा। इन सभी पर हम शोध करें, लिखें और अपनी युवा पीढ़ी को इससे परिचित कराएं।” धर्मार्थ न्यास और उसके अध्यक्ष ट्रस्टी डॉ कर्ण सिंह के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इस पुनीत कार्य में लगे सभी विद्वानों, इससे जुड़े हर व्यक्ति और उनके हर प्रयास को वे आदरपूर्वक नमन करते हैं। जम्मू-कश्मीर के विचारकों ने देश की आध्यात्मिक चेतना का नेतृत्व किया है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार सामान्य तौर पर श्रीमद्भवत गीत को एकल व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने का प्रचलन है। पहली बार प्रसिद्ध भारतीय विद्वानों की प्रमुख व्याख्याओं को इस ग्रंथ की व्यापक और तुलनात्मक समझ प्राप्त करने के लिए एक साथ लायी जा रहा है। धर्मार्थ ट्रस्ट की ओर से प्रकाशित पांडुलिपि, असाधारण विविधता और भारतीय सुलेख की सूक्ष्मता की साथ तैयार की गयी है, जिसमें शंकर भाष्य से लेकर भाषानुवाद तक को शामिल किया गया है। हिन्दुस्थान समाचार/अनूप

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