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Friday, March 13, 2026
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दो बार लोकसभा चुनाव हारे थे भीमराव आंबेडकर, उनके चुनाव हारने में किसकी भूमिका रही?

राज्यसभा में संविधान पर बहस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की डॉ. भीमराव आंबेडकर के बारे में की गई टिप्पणी पर उन्हें कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के नेताओं ने माफी मांगने के लिए कहा है ।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। राज्यसभा में संविधान पर बहस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के डॉ. भीमराव आंबेडकर के बारे में की गई टिप्पणी पर उन्हें कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के नेताओं ने माफी मांगने के लिए कहा है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि अमित शाह की टिप्पणी से पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी और RSS नेताओं के बीच बीआर आंबेडकर के प्रति बहुत नफरत है। बता दें कि अमित शाह ने कहा था कि ”वर्तमान में एक फैशन चल गया है- आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, अगर ये नाम भगवान से लिया होता तो सात जन्म सीधे स्वर्ग मिलता। 

“72 साल पहले कांग्रेस पार्टी लगभग अजेय थी”

संविधान के 75 साल पूरे होने पर राज्यसभा में दो दिन तक बहस हुई। मंगलवार को अपने समापन संबोधन में अमित शाह ने कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधते हुए ये बात कही थी। अब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस टिप्पणी को लेकर उन पर निशाना साधा है और माफी की मांग की है। उधर, केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कह कहकर कि “यह कांग्रेस ही थी जिसने बीआर आंबेडकर को दो बार लोकसभा चुनाव हराया।” एक नई बहस को जन्म दे दिया है। क्योंकि यह सच है कि देश के संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर को दो बार लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। दोनों बार कांग्रेस प्रत्याशी ने उन्हें हराया। 72 साल पहले कांग्रेस पार्टी अजेय थी।

1952 में चुनावी मैदान में उतरे थे बाबा साहेब आंबेडकर

देश में पहला लोकसभा चुनाव 1952 में हुआ और जवाहरलाल नेहरू उम्मीदवार थे। उस समय देश में जवाहरलाल नेहरू की लहर थी। उस समय जिसे भी कांग्रेस का टिकट मिलता, वह जीत ही जाता था। इस चुनाव में संविधान निर्माता डाॅ. बाबा साहेब आंबेडकर भी खड़े थे। पहले लोकसभा चुनाव में आंबेडकर ने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन पार्टी से चुनाव लड़ा। लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वे देशभर में अनुसूचित जाति के कद्दावर नेता के तौर पर जाने जाते थे, पर मुंबई में उनके निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस ने आंबेडकर के खिलाफ अपने पीए नारायण एस काजरोलकर को मैदान में उतारा। वह भी पिछड़े वर्ग से थे। 

उस वक्त अंबेडकर चौथे नंबर पर थे

इसके अलावा कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा से भी एक-एक उम्मीदवार थे। नारायण काजरोलकर दूध व्यवसायी थे। लेकिन नेहरू जी की लहर इतनी बड़ी थी कि नारायण काजरोलकर 15 हजार वोटों से जीत गए। उस वक्त आंबेडकर चौथे नंबर पर थे। आजादी के बाद जब जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पहली अंतरिम सरकार बनी तो आंबेडकर कानून मंत्री थे। आंबेडकर अनुसूचित जातियों के प्रति कांग्रेस की नीतियों से खुश नहीं थे। हिंदू कोड बिल पर कांग्रेस के साथ मतभेद के कारण उन्होंने 27 दिसंबर 1951 को सरकार से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद आंबेडकर ने अनुसूचित जातियों को संगठित करना शुरू किया। उन्होंने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन नाम से एक संगठन बनाया। उनके इस्तीफे के करीब एक साल बाद देश में पहला आम चुनाव हुआ, लेकिन केवल दो ही जीते।नेहरू ने कांग्रेस उम्मीदवार काजोलकर के लिए चुनावी सभाएं की। वह कांग्रेस उम्मीदवार के लिए प्रचार करने के लिए दो बार इस निर्वाचन क्षेत्र में गए।

बीमारी के कारण 6 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई

आंबेडकर की हार का सिलसिला यहीं नहीं रुका। 1954 में आंबेडकर को बंदरा लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में एक बार फिर अपनी किस्मत आजमाने का मौका मिला। लेकिन इस बार भी आंबेडकर को हार का सामना करना पड़ा। इस बार वह सिर्फ आठ हजार वोटों से हारे। अम्बेडकर अपनी हार से बहुत दुखी थे। कांग्रेस ने कहा कि चूंकि आंबेडकर सोशल पार्टी के साथ थे, इसलिए उनके पास उनका विरोध करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था। पहले लोकसभा चुनाव में हार के बाद आंबेडकर बीमार रहने लगे। डॉ. आंबेडकर अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे। उन्होंने संसद पहुंचकर सबसे पहले किए जाने वाले कामों की सूची तैयार कर ली थी, किन्तु लगातार दो हार के बाद आंबेडकर अंदर से टूट गये। इससे उन्हें गहरा सदमा लगा और वे बहुत बीमार हो गये। बाद में इसी बीमारी के कारण छह दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई।

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