नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। उत्तराखंड में 54 करोड़ रुपये के ज़मीन घोटाले को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बड़ा फैसला लिया है। हरिद्वार के जिलाधिकारी (DM) समेत तीन अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया है। यह कदम सरकारी धन की हेराफेरी और नियमों के उल्लंघन को लेकर उठाया गया।
क्या है मामला?
हरिद्वार नगर निगम ने कूड़े के ढेर के पास स्थित एक अनुपयुक्त और कृषि भूमि को 54 करोड़ रुपये में खरीद लिया। इस ज़मीन की न तो वास्तव में जरूरत थी, और न ही इसे खरीदने के लिए पारदर्शी बोली प्रक्रिया अपनाई गई। ये पूरा सौदा राज्य सरकार के नियमों को दरकिनार करके किया गया था, जिससे कई सवाल उठे और मामले की जांच शुरू हुई।
किन अधिकारियों पर हुई कार्रवाई?
मुख्यमंत्री को जब इस घोटाले की जांच रिपोर्ट मिली तो उन्होंने तुरंत इन अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की कर्मेन्द्र सिंह (DM, हरिद्वार) बिना ठोस आधार के ज़मीन खरीद की अनुमति देने में संलिप्त पाए गए। वरुण चौधरी (पूर्व नगर आयुक्त) नियमों की अनदेखी कर प्रस्ताव पास किया और वित्तीय अनियमितताएं कीं। अजयवीर सिंह (SDM) ज़मीन का निरीक्षण और रिपोर्टिंग लापरवाही से की, जिससे सरकार तक गलत जानकारी पहुंची। इन तीनों अधिकारियों को उनके वर्तमान पद से हटा दिया गया है और विभागीय कार्रवाई शुरू हो गई है।
पहले भी हो चुकी है कार्रवाई
इस मामले में पहले भी कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई की जा चुकी है रविंद्र कुमार दयाल (प्रभारी सहायक नगर आयुक्त) आनंद सिंह मिश्रवाण (प्रभारी अधिशासी अभियंता) लक्ष्मीकांत भट्ट (कर एवं राजस्व अधीक्षक) दिनेश चंद्र कांडपाल (अवर अभियंता) इन सभी को पहले ही निलंबित कर दिया गया है। साथ ही, संपत्ति लिपिक वेदवाल का सेवा विस्तार समाप्त कर दिया गया है और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू की गई है। अब इस पूरे मामले की जांच विजिलेंस विभाग को सौंपी गई है। इसका मतलब है कि अब जांच और भी गहराई से होगी और यदि अन्य लोग भी दोषी पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई होगी।
मुख्यमंत्री का सख्त संदेश: पद नहीं, जवाबदेही जरूरी
मुख्यमंत्री धामी ने कहा है कि उत्तराखंड में अब “पद” नहीं बल्कि कर्तव्य और जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं। चाहे कोई अधिकारी कितना भी वरिष्ठ हो, यदि वह नियमों की अवहेलना करेगा तो कार्रवाई तय है। इस फैसले से राज्य की जनता में यह विश्वास जगा है कि अब भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार सिर्फ योजनाएं बनाने में नहीं, बल्कि व्यवस्था को दुरुस्त करने में भी गंभीर है। यह घटना बाकी अधिकारियों के लिए भी एक सख्त चेतावनी है। जब इस मामले में निलंबित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उनके फोन बंद मिले। इसलिए उनका पक्ष फिलहाल सामने नहीं आ सका है।




