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Tuesday, April 7, 2026
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CJI सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी: रिटायरमेंट से पहले ‘छक्के’ क्यों मार रहे हैं जज?

रिटायरमेंट से पहले ‘छक्के’ लगाने वाले जजों पर CJI सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी। सुप्रीम कोर्ट बोला-गलत आदेश और बेईमानी में फर्क जरूरी, नहीं तो बढ़ेगी चिंता।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने रिटायरमेंट से ठीक पहले पारित किए जा रहे कुछ विवादित न्यायिक आदेशों पर कड़ा रुख अपनाया है। बुधवार, 17 दिसंबर 2025 को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत ने इसे गंभीर और चिंताजनक प्रवृत्ति बताते हुए कहा कि कुछ जज सेवानिवृत्ति से पहले ऐसे फैसले दे रहे हैं, मानो क्रिकेट मैच के आखिरी ओवर में बल्लेबाज ताबड़तोड़ छक्के लगा रहा हो। यह टिप्पणी मध्य प्रदेश के एक जिला जज की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिन्हें रिटायरमेंट से महज 10 दिन पहले दो आदेश पारित करने के चलते निलंबित कर दिया गया था।

CJI सूर्यकांत की टिप्पणी और पीठ का रुख

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने सेवानिवृत्ति से ठीक पहले “छक्के लगाने” शुरू कर दिए थे, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य तौर पर गलत न्यायिक आदेशों के लिए किसी न्यायिक अधिकारी को निलंबित नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे आदेशों को अपील या उच्च अदालत में सुधारा जा सकता है। हालांकि, CJI ने अहम सवाल उठाया-अगर आदेश स्पष्ट रूप से बेईमानी या बाहरी हितों से प्रेरित हों, तो क्या होगा?

जज का पक्ष और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

मध्य प्रदेश के यह जिला जज 30 नवंबर को रिटायर होने वाले थे, लेकिन 19 नवंबर को उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राज्य में जजों की रिटायरमेंट उम्र 62 साल किए जाने से उनका कार्यकाल एक साल बढ़ गया। जज की ओर से सीनियर एडवोकेट विपिन सांघी ने दलील दी कि उनका सर्विस रिकॉर्ड बेदाग है और उन्हें हमेशा अच्छे मूल्यांकन मिले हैं। उन्होंने सस्पेंशन की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल न्यायिक आदेशों के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों से आंशिक सहमति जताते हुए कहा कि न्यायिक त्रुटि और कदाचार में फर्क किया जाना जरूरी है। हालांकि, कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए जज को पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जाने की सलाह दी। साथ ही, अदालत ने निलंबन से जुड़ी जानकारी आरटीआई के जरिए मांगने पर भी आपत्ति जताई और कहा कि वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी को ऐसे मामलों में अभ्यावेदन का सहारा लेना चाहिए।

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