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Sunday, March 8, 2026
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ऑपरेशन सफल, मरीज मृत’ जैसी स्थिति ना बने! CJI गवई की बेंच ने तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को सुनाई खरी खरी

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तेलंगाना में विधायकों के दलबदल से जुड़े मामले में विधानसभा अध्यक्ष की चुप्पी पर नाराजगी जताई।

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तेलंगाना में विधायकों के दलबदल से जुड़े मामले में विधानसभा अध्यक्ष की चुप्पी पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि अगर अयोग्यता याचिकाओं पर समय पर फैसला नहीं लिया गया तो यह स्थिति “ऑपरेशन सफल, मरीज मृत” जैसी हो जाएगी। मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे बीआरएस भारत राष्ट्र समिति से कांग्रेस में शामिल हुए 10 विधायकों के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर तीन महीने में फैसला करें।

कोर्ट ने क्यों लगाई फटकार?

कोर्ट को यह जानकारी दी गई कि इन विधायकों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर पिछले सात महीनों से कोई नोटिस तक जारी नहीं किया गया। इस पर अदालत ने कहा, “यह तय करने का काम कि स्पीकर ने तेजी दिखाई या नहीं हमारा कर्तव्य बनता है। सात महीने तक कोई कार्रवाई नहीं करना, त्वरित प्रक्रिया नहीं कही जा सकती।

लोकतंत्र को नुकसान हो सकता है: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर राजनीतिक दलबदल पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो इससे लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो सकती हैं। अदालत ने कहा कि स्पीकर संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत एक न्यायाधिकरण की भूमिका में होते हैं, इसलिए उन पर न्यायिक जांच से छूट नहीं मिल सकती। बेंच ने यह भी कहा कि अयोग्यता मामलों में हो रही देरी को रोकने के लिए एक ठोस तंत्र विकसित करना संसद का काम है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि संसद को यह सोचना चाहिए कि क्या स्पीकर को अयोग्यता तय करने का अधिकार देना आज की जरूरतों के हिसाब से प्रभावी व्यवस्था है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच के 22 नवंबर 2024 के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अयोग्यता प्रक्रिया पर रोक लगाने का निर्णय दिया गया था। कोर्ट ने दोहराया कि इस तरह की प्रक्रिया अदालतों में देर से बचने के लिए स्पीकर को सौंपी गई थी, लेकिन अब वही देरी स्पीकर की ओर से हो रही है।

विधायक देरी करें, तो स्पीकर खुद निर्णय लें: कोर्ट

कोर्ट ने अध्यक्ष से कहा कि अगर विधायक जानबूझकर कार्यवाही को टालते हैं, तो वे प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकते हैं। यानी स्पीकर यह मान सकते हैं कि याचिकाओं में लगाए गए आरोप सही हैं। इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ विधानसभा अध्यक्ष को जिम्मेदार ठहराया, बल्कि संसद को भी यह सोचने को कहा कि क्या वर्तमान प्रक्रिया लोकतंत्र की रक्षा में सक्षम है। अब सबकी निगाहें इस बात पर होंगी कि तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष अगले तीन महीनों में क्या फैसला लेते हैं।

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