back to top
25.1 C
New Delhi
Wednesday, April 8, 2026
spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

लगातार बढ़ती स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां

विश्व स्वास्थ्य दिवस (7 अप्रैल) पर विशेष योगेश कुमार गोयल लोगों के स्वास्थ्य स्तर को सुधारने तथा स्वास्थ्य को लेकर प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को वैश्विक स्तर ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस को मनाए जाने का प्रमुख उद्देश्य दुनिया के हर व्यक्ति को इलाज की अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना, उनका स्वास्थ्य बेहतर बनाना, उनके स्वास्थ्य स्तर को ऊंचा उठाना तथा समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक कर स्वस्थ वातावरण बनाते हुए स्वस्थ रखना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के बैनर तले मनाए जाने वाले इस दिवस की शुरूआत 7 अप्रैल 1950 को हुई थी और यह दिवस मनाने के लिए इसी तारीख का निर्धारण डब्ल्यूएचओ की संस्थापना वर्षगांठ को चिन्हित करने के उद्देश्य से किया गया था। दरअसल सम्पूर्ण विश्व को निरोगी बनाने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ नामक वैश्विक संस्था की स्थापना 7 अप्रैल 1948 को हुई थी, जिसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में है। कुल 193 देशों ने मिलकर जेनेवा में इस वैश्विक संस्था की नींव रखी थी, जिसका मुख्य उद्देश्य यही है कि दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा हो, बीमार होने पर उसे बेहतर इलाज की पर्याप्त सुविधा मिल सके। संस्था की पहली बैठक 24 जुलाई 1948 को हुई थी और इसकी स्थापना के समय इसके संविधान पर 61 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। संगठन की स्थापना के दो वर्ष बाद ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाने की परम्परा शुरू की गई। इस वर्ष कोरोना की महामारी से जूझ रही पूरी दुनिया 71वां विश्व स्वास्थ्य दिवस मना रही है, ऐसे में विश्वभर में लोगों के स्वास्थ्य के दृष्टिगत इस दिवस की महत्ता इस वर्ष भी पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। एक वर्ष से भी ज्यादा समय से कोरोना से लड़ी जा रही जंग में प्रत्येक देश का यही प्रयास है कि कोरोना से जल्द से जल्द निजात पाई जा सके और इसके लिए दुनियाभर में कोविड वैक्सीनेशन का कार्य चल भी रहा है। संयुक्त राष्ट्र का अहम हिस्सा ‘डब्ल्यूएचओ’ दुनिया के तमाम देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग और मानक विकसित करने वाली संस्था है। इस संस्था का प्रमुख कार्य विश्वभर में स्वास्थ्य समस्याओं पर नजर रखना और उन्हें सुलझाने में सहयोग करना है। अपनी स्थापना के बाद इस वैश्विक संस्था ने ‘स्मॉल पॉक्स’ जैसी बीमारी को जड़ से खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। टीबी, एड्स, पोलियो, रक्ताल्पता, नेत्रहीनता, मलेरिया, सार्स, मर्स, इबोला जैसी खतरनाक बीमारियों के बाद कोरोना की रोकथाम के लिए भी जी-जान से जुटी है। इस संस्था के माध्यम से प्रयास किया जाता है कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहे। भारतीय समाज में तो सदियों से धारणा भी रही है ‘जान है तो जहान है’ तथा ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया’। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ अर्थात् ‘सब सुखी हों और सभी रोगमुक्त हों’ मूलमंत्र में यही स्वास्थ्य भावना निहित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का पहला लक्ष्य वैश्विक स्वास्थ्य कवरेज रहा है लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह सुनिश्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि समुदाय में सभी लोगों को अपेक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं व देखभाल मिले। हालांकि दुनिया के तमाम देश स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहे हैं लेकिन कोरोना जैसे वायरसों के समक्ष जब पिछले साल अमेरिका जैसे विकसित देश को भी बेबस अवस्था में देखा और वहां भी स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरी सामान की भारी कमी नजर आई, तब पूरी दुनिया को अहसास हुआ कि अभी भी जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन तो स्वयं यह भी मानता है कि दुनिया की कम से कम आधी आबादी को आज भी आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। विश्वभर में अरबों लोगों को स्वास्थ्य देखभाल हासिल नहीं होती। करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं तथा स्वास्थ्य देखभाल में से किसी एक को चुनने पर विवश होना पड़ता है। जन-स्वास्थ्य से जुड़े कुछ वैश्विक तथ्यों पर ध्यान दिया जाए तो हालांकि टीकाकरण, परिवार नियोजन, एचआईवी के लिए एंटीरिट्रोवायरल उपचार तथा मलेरिया की रोकथाम में सुधार हुआ है लेकिन चिंता की स्थिति यह है कि अभी भी दुनिया की आधी से अधिक आबादी तक आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच नहीं है। विश्वभर में 80 करोड़ से भी ज्यादा लोग अपने घर के बजट का कम से कम दस फीसदी स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर खर्च करते हैं। यही नहीं, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर बड़ा खर्च करने के कारण दस करोड़ से ज्यादा लोग अत्यधिक गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। चिंता की स्थिति यह है कि पिछले कुछ दशकों में एक ओर जहां स्वास्थ्य क्षेत्र ने काफी प्रगति की है, वहीं कुछ वर्षों के भीतर एड्स, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के प्रकोप के साथ हृदय रोग, मधुमेह, क्षय रोग, मोटापा, तनाव जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां निरन्तर बढ़ रही हैं। अगर भारत की बात की जाए तो मौजूदा कोरोना काल को छोड़ दें तो आर्थिक दृष्टि से देश में पिछले दशकों में तीव्र गति से आर्थिक विकास हुआ लेकिन कड़वा सच यह भी है कि तेज गति से आर्थिक विकास के बावजूद इसी देश में करोड़ों लोग कुपोषण के शिकार हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार तीन वर्ष की अवस्था वाले तीन फीसदी से भी अधिक बच्चों का विकास अपनी उम्र के हिसाब से नहीं हो सका है और चालीस फीसदी से अधिक बच्चे अपनी अवस्था की तुलना में कम वजन के हैं। इनमें करीब अस्सी फीसदी बच्चे रक्ताल्पता (अनीमिया) से पीडि़त हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक दस में से सात बच्चे अनीमिया से पीडि़त हैं जबकि महिलाओं की तीस फीसदी से ज्यादा आबादी कुपोषण की शिकार है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक देश में अभी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह मुफ्त नहीं हैं और जो हैं, उनकी स्थिति संतोषजनक नहीं है। भारत में ग्रामीण तथा कमजोर आबादी में सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का विस्तार करने के उद्देश्य से ‘आयुष्मान भारत कार्यक्रम’ की शुरूआत की गई थी, जिसके तहत देश की जरूरतमंद आबादी को अपेक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। इसके अलावा ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण मिशन’ (एनएचपीएम) के तहत दस करोड़ से अधिक गरीब लोगों और कमजोर परिवारों की स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक परिवार को पांच लाख रुपये वार्षिक की कवरेज प्रदान की जा रही है। हालांकि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को देखा जाए तो देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की बड़ी कमी है। यहां डॉक्टरों तथा आबादी का अनुपात संतोषजनक नहीं है, बिस्तरों की उपलब्धता भी बेहद कम है। देश में सवा अरब से अधिक आबादी के लिए महज 26 हजार अस्पताल हैं अर्थात् 47 हजार लोगों पर सिर्फ एक सरकारी अस्पताल है। देशभर के सरकारी अस्पतालों में इतनी बड़ी आबादी के लिए करीब सात लाख बिस्तर हैं। सरकारी अस्पतालों में करीब 1.17 लाख डॉक्टर हैं अर्थात् दस हजार से अधिक लोगों पर महज एक डॉक्टर ही उपलब्ध है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के नियमानुसार प्रति एक हजार मरीजों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। कुछ राज्यों में तो स्थिति यह है कि 40 से 70 हजार ग्रामीण आबादी पर केवल एक सरकारी डॉक्टर ही उपलब्ध है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अधिकांश लोग जाने-अनजाने में स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कामकाज के साथ अपने स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान रखें ताकि जिंदगी की यह रफ्तार पूरी तरह दवाओं पर निर्भर होकर न रह जाए। बेहतर होगा, अगर व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा समय योग या व्यायाम के लिए निकाला जाए और भोजन में ताजी सब्जियों, मौसमी फलों और फाइबर युक्त हैल्दी डाइट का समावेश किया जाए। बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य दिवस के माध्यम से जहां समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जाता है, वहीं इसका सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यही होता है कि लोगों को स्वस्थ वातावरण बनाकर स्वस्थ रहना सिखाया जा सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Advertisementspot_img

Also Read:

spot_img

Latest Stories

एक्ट्रेस Zareen Khan की मां का हुआ निधन, लंबे समय से बीमार थीं Parveen Khan

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। एक्ट्रेस जरीन खान (Zareen Khan)...

UP Election 2027: OP Rajbhar का बड़ा ऐलान, आजमगढ़ की अतरौलिया सीट से ठोकेंगे ताल

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027...

200MP कैमरा वाला Samsung Galaxy S24 Ultra हुआ 36 हजार रुपये सस्ता, यहां मिल रही शानदार डील; जानिए कैसे उठाएं पूरा फायदा

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। प्रीमियम स्मार्टफोन खरीदने की सोच...

DC vs GT: दिल्ली में रनों की बरसात तय, किसका होगा पलड़ा भारी?

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। IPL 2026 में Delhi Capitals और...

Mrunal Thakur ने की Ranveer Singh की तारीफ, उनको बताया अपना लकी चार्म

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। मृणाल ठाकुर (Mrunal Thakur) इन...

Share Market Today: खुलते ही दौड़ा शेयर बाजार, Sensex 2674 अंक चढ़कर खुला, Nifty भी मजबूत

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव...
⌵ ⌵ ⌵ ⌵ Next Story Follows ⌵ ⌵ ⌵ ⌵