नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। महाराष्ट्र के अंबरनाथ नगर परिषद में बीजेपी और कांग्रेस का बना गठबंधन कुछ ही घंटों में टूट गया। शिंदे गुट को सत्ता से बाहर रखने के लिए बना यह राजनीतिक समीकरण दोनों पार्टियों के लिए भारी पड़ गया। जैसे ही इसकी खबर सामने आई, दोनों दलों की जबरदस्त आलोचना शुरू हो गई। पार्टी की किरकिरी होते देख कांग्रेस ने तुरंत कदम पीछे खींचते हुए अपने ब्लॉक अध्यक्ष को सस्पेंड कर दिया।
क्यों बना था कांग्रेस-बीजेपी गठबंधन?
दरअसल, अंबरनाथ नगर परिषद में एकनाथ शिंदे की शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी है। बीजेपी दूसरे और कांग्रेस तीसरे नंबर पर है। शिवसेना (शिंदे) को सत्ता से दूर रखने के लिए बीजेपी और कांग्रेस ने हाथ मिलाया और इस गठबंधन को ‘अंबरनाथ विकास अघाड़ी’ नाम दिया गया। इस गठबंधन के पास 31 पार्षदों का समर्थन था, जबकि बहुमत के लिए 30 का आंकड़ा जरूरी था।
विवाद बढ़ते ही टूटा गठबंधन
जैसे ही बीजेपी-कांग्रेस गठबंधन की खबर सार्वजनिक हुई, दोनों पार्टियों के अंदर और बाहर से विरोध शुरू हो गया। कार्यकर्ताओं और नेताओं ने इसे विचारधारा के खिलाफ बताया। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इसकी आलोचना होने लगी। दबाव बढ़ते ही कांग्रेस ने कदम पीछे खींच लिए और गठबंधन से खुद को अलग कर लिया। गठबंधन करने के मामले में कांग्रेस ने अंबरनाथ के ब्लॉक अध्यक्ष पर कार्रवाई करते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया। पार्टी का कहना है कि बीजेपी के साथ गठबंधन का फैसला बिना हाईकमान की अनुमति के लिया गया था, जो अनुशासन के खिलाफ है।
सीएम फडणवीस की सख्त चेतावनी
इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी नाराजगी जताई थी। उन्होंने साफ कहा था कि कांग्रेस या AIMIM के साथ किसी भी तरह का गठबंधन स्वीकार नहीं किया जाएगा। फडणवीस ने कहा, “पार्टी की अनुमति के बिना ऐसा गठबंधन अनुशासनहीनता है, इसके खिलाफ कार्रवाई होगी। उनकी फटकार के बाद ही कांग्रेस की तरफ से कार्रवाई तेज हुई।
अंबरनाथ नगर परिषद का पूरा गणित
अंबरनाथ नगर परिषद में कुल 59 पार्षद हैं, शिवसेना (शिंदे) – 28 सीटें, बीजेपी – 15 सीटें, कांग्रेस – 12 सीटें एनसीपी (अजित पवार) – 4 सीटें बीजेपी और कांग्रेस मिलकर 31 का आंकड़ा छू रहे थे, लेकिन यह गठबंधन ज्यादा देर नहीं टिक सका। शिवसेना (शिंदे) के विधायक डॉक्टर बालाजी किनीकर ने इस गठबंधन को विश्वासघात बताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मुक्त भारत की बात करने वाली बीजेपी का कांग्रेस के साथ हाथ मिलाना शिवसेना की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है। अंबरनाथ की यह घटना साफ दिखाती है कि स्थानीय राजनीति में बन रहे अप्रत्याशित गठबंधन अब पार्टियों के लिए मुसीबत बनते जा रहे हैं। विचारधारा से हटकर लिए गए फैसले न सिर्फ विवाद खड़ा कर रहे हैं, बल्कि पार्टी नेतृत्व को भी सख्त कदम उठाने पर मजबूर कर रहे हैं।




