नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जाति आधारित रैलियों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले ने सूबे की राजनीति में नया भूचाल ला दिया है। जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस फैसले के खिलाफ अब उन्हीं के सहयोगी और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद खुलकर मैदान में उतर आए हैं। लखनऊ में पत्रकारों से बात करते हुए संजय निषाद ने साफ शब्दों में कहा कि,जातियों के अधिकारों की आवाज दबाना संविधान के खिलाफ है। उन्होंने राज्य सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है और चेतावनी दी है कि,अगर जरूरत पड़ी तो इस मसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष भी उठाया जाएगा।
जातियों का सम्मान जरूरी, न कि बहस का विषय
डॉ. संजय निषाद ने कहा कि जो जातियां दशकों से सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी हैं, उनकी आवाज अगर मंचों से नहीं उठेगी तो वे और पीछे छूट जाएंगी। उन्होंने कहा, “समय आ गया है जब सभी जातियों को बराबरी का हक मिले। लेकिन यदि जातीय रैलियों पर रोक लगाई जाएगी, तो यह सामाजिक न्याय के खिलाफ होगा।
सरकार की मंशा पर उठाए सवाल’
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में राज्य में जातिगत भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से जाति आधारित रैलियों पर रोक लगाने का ऐलान किया है। इसके तहत सार्वजनिक स्थानों पर जाति विशेष के नाम पर सभाएं नहीं हो सकेंगी। साथ ही, एफआईआर, गिरफ्तारी मेमो और अन्य पुलिस रिकॉर्ड्स में भी किसी की जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा। इसमें सरकार का तर्क है कि, यह कदम समानता और समरसता को बढ़ावा देने की दिशा में अहम है। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर जाति के नाम पर प्रचार या नफरत फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं।
निषाद पार्टी का विरोध क्या बढ़ाएगा NDA में दरार?
संजय निषाद का यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में आगामी निकाय चुनावों की सरगर्मियां तेज हो रही हैं। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह मुद्दा एनडीए में दरार का कारण बन सकता है?
हालांकि अभी तक भाजपा की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर वैचारिक मतभेदों की ओर संकेत करता है।
जाति आधारित रैलियों पर रोक
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जाति आधारित रैलियों पर लगाई गई रोक अब उसकी सहयोगी पार्टियों को ही खटकने लगी है। निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्य सरकार में मंत्री डॉ. संजय निषाद ने इस फैसले पर सख्त ऐतराज़ जताते हुए योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
सामाजिक न्याय का सपना अधूरा रह जाएगा। डॉ. निषाद ने साफ शब्दों में कहा कि अगर जातियों के हितों की आवाज़ उठाना भी बंद हो जाएगा, तो सामाजिक न्याय का सपना अधूरा रह जाएगा। उन्होंने सरकार को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यह फैसला वंचित और पीड़ित वर्गों के खिलाफ है, और यदि जरूरत पड़ी तो वे इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी उठाएंगे।
”आईना दिखाना जरूरी था”
संजय निषाद ने कहा, “हमारी पार्टी का अस्तित्व ही उन जातियों की लड़ाई से जुड़ा है, जो सदियों से हाशिये पर हैं। अगर रैलियों के ज़रिए उनकी आवाज़ उठाना बंद कर दिया जाएगा, तो यह लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ होगा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि, योगी सरकार को आईना दिखाना जरूरी हो गया है, क्योंकि सभी जातियों का समग्र विकास तभी होगा जब उनकी समस्याएं खुलकर सामने आएंगी।
क्या है सरकार का फैसला?
राज्य सरकार ने हाल ही में जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए कई अहम फैसले लिए हैं। इसके तहत, जाति आधारित रैलियों पर राज्यभर में पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। एफआईआर, गिरफ्तारी मेमो और अन्य पुलिस दस्तावेजों में किसी की जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा। सरकारी और कानूनी दस्तावेजों में जाति कॉलम हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। सोशल मीडिया पर जाति का महिमामंडन या भड़काऊ प्रचार करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकार का कहना है कि ये कदम एक राष्ट्र, एक पहचान की सोच के तहत लिए गए हैं, जिससे सामाजिक समरसता और समानता को बढ़ावा मिल सके।
सियासी गलियारों में हलचल तेज
संजय निषाद का यह बयान ऐसे वक्त पर आया है जब राज्य में सामाजिक समीकरणों को लेकर राजनीतिक तापमान चरम पर है। जानकार मानते हैं कि एनडीए के भीतर यह पहला ऐसा बड़ा मुद्दा हो सकता है जो सहयोगियों के बीच खटास पैदा कर सकता है। हालांकि भाजपा की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन सूत्रों की मानें तो पार्टी नेतृत्व इस मामले को टालने के बजाय बातचीत के जरिए हल करना चाहता है।




