नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। भारत के गौरवशाली इतिहास में 19 दिसंबर का दिन सुनहरे अक्षरों मे लिखा गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि आज ही का दिन था जब अंग्रेजों से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खां ने हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। 19 दिसंबर 1927 को उन्हें अंग्रेजों से फैजाबाद जेल में काकोरी कांड की वजह से फांसी दे दी थी। उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए काकोरी में अंग्रेजों का सारा खजाना लूट लिया था।
क्या था काकोरी कांड?
अशफाक उल्ला खां शुरुआत से ही क्रांतिकारी विचारों के रहे थे, महात्मा गांधी को वह अपना आदर्श मानते थे। उनसे प्रेरणा लेते हुए उन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद के साथ एक बैठक में भाग लिया। इस बैठक में फैसला हुआ कि 9 अगस्त 1925 को अंग्रेजों से सारा खजाना लूट लिया जाएगा जिसे उन्होंने भारतीयों से लूटा है। हुआ भी ऐसा ही, सहारनपुर से लखनऊ आ रही पैसेंजर ट्रेन को काकोरी स्टेशन के पास सारा खजाना लूट लिया। अशफाक उल्ला खां का मानना था कि जो खजाना भारतीयों का है वह उन्ही के पास रहना चाहिए। इसी घटना को इतिहास के पन्नों में काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है।
अशफाक उल्ला खां को फांसी दे दी गई
इस घटना की जानकारी जैसै ही अंग्रेजी हुकुमत को लगी वैसे ही वह बौखला गई। अशफाक उल्ला खां और उनके साथियों को पकड़ने के लिए धरपकड़ शुरु हो गई थी। अपना नाम बदलने के बावजूद अशफाक उल्ला खां अंग्रेजों की गिरफ्त में आ गए और 19 दिसंबर 1927 को उन्हें फांसी की सजा दे दी गई। इसी दिन राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र लहरी को काकोरी कांड का दोषी मानते हुए अलग अलग जिलो में फांसी दे दी गई।





