नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। 2026 में भारतीय राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंचने जा रही है। यूपी की राजनीति में दशकों तक मजबूत आधार रखने वाली बसपा, राज्यसभा में अपने एकमात्र सांसद रामजी गौतम के कार्यकाल के समाप्त होने के साथ ही संसद में पूरी तरह गायब हो जाएगी। 36 साल में पहली बार ऐसा होगा जब संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में बसपा का कोई सदस्य नहीं होगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए कोई सीट नहीं खुल पाई थी और अब 2026 में राज्यसभा में भी पार्टी की कोई उपस्थिति नहीं रहेगी। इसका सीधा असर दलित और अल्पसंख्यक मुद्दों की आवाज संसद में कमजोर होने के रूप में देखने को मिलेगा।
राज्यसभा में रामजी गौतम के रिटायरमेंट से आएगा बदलाव
उत्तर प्रदेश के 10 राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त होगा, जिसमें बीजेपी के आठ, सपा के एक और बसपा के एक सदस्य शामिल हैं। रामजी गौतम साल 2019 में बीजेपी के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे थे और उनका कार्यकाल 2026 के अंत में पूरा होगा। उनके रिटायर होने के बाद बसपा के पास न तो लोकसभा में और न ही राज्यसभा में कोई सदस्य बचेगा। वर्तमान विधानसभा आंकड़ों के अनुसार बसपा के पास केवल एक विधायक है, जो उसे राज्यसभा में सीट जीतने या नामांकन की स्थिति में भी सक्षम नहीं बनाता। यही कारण है कि 2026 में संसद में बसपा की उपस्थिति पूरी तरह शून्य हो जाएगी।
बसपा का राजनीतिक आधार और वापसी की संभावना
उत्तर प्रदेश बसपा का प्रमुख गढ़ रहा है, लेकिन आज पार्टी का सियासी आधार बेहद कमजोर हो गया है। यूपी विधानसभा में बसपा के पास मात्र एक विधायक है और विधान परिषद में भी उसका कोई सदस्य नहीं है। इस स्थिति में पार्टी को 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव का इंतजार करना होगा, तभी वह संसद में अपनी उपस्थिति को पुनः सुनिश्चित कर सकेगी। यदि 2027 में भी बसपा कम से कम 40 सीटें नहीं जीत पाती, तो उसके 2029 तक संसद में प्रतिनिधित्व की संभावना बेहद कम होगी।
बसपा की ऐतिहासिक यात्रा और संसद में योगदान
बसपा की स्थापना 1984 में कांशीराम ने की थी। 1989 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा ने अपने पहले तीन सांसद लोकसभा भेजे थे। मायावती भी 1989 में लोकसभा पहुंची और बाद में 1994 में पहली बार राज्यसभा सदस्य बनीं। 1994 से लेकर अब तक बसपा के नेता लगातार संसद में दलित और अल्पसंख्यक मुद्दों की आवाज उठाते रहे हैं। हालांकि, 2026 में रामजी गौतम के रिटायर होने के साथ यह परंपरा टूट जाएगी और बसपा संसद से गायब हो जाएगी।
राष्ट्रीय दर्जे पर संकट
बसपा के लिए राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी संकट में है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को केवल 2.04 फीसदी वोट मिले, जो उसे राष्ट्रीय पार्टी के मानकों पर खरा नहीं उतरता। पार्टी ने 2019 के बाद से किसी अन्य राज्य में पर्याप्त जनाधार नहीं बनाया है। यह स्थिति राजनीतिक रूप से बसपा के लिए चुनौतीपूर्ण है और उसके राष्ट्रीय दर्जे पर सवाल खड़े कर रही है।
2026 के अंत में रामजी गौतम के रिटायर होने के साथ ही बसपा का संसद में प्रतिनिधित्व खत्म हो जाएगा। 36 साल के इतिहास में पहली बार संसद के दोनों सदनों में बसपा का कोई सदस्य नहीं रहेगा। उत्तर प्रदेश में कमजोर आधार और आगामी विधानसभा चुनावों की अनिश्चित स्थिति के कारण बसपा को संसद में वापसी के लिए 2027 का इंतजार करना होगा। पार्टी के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण और ऐतिहासिक क्षण है।




