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Monday, April 6, 2026
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क्या मुगल ही भारतीय इतिहास का पर्याय हैं, पढ़िए क्या कहते हैं एक्सपर्ट

इतिहासविद् डॉ. विवेक भटनागर ने कहा कि एनसीईआरटी की कक्षा 12 की ‘भारतीय इतिहास के कुछ विषय’ पुस्तक तीन भागों में प्रकाशित है।

उदयपुर, एजेंसी। अब तक दिल्ली केन्द्रित इतिहास ही पढ़ाया गया है। क्या मुगल ही भारतीय इतिहास का पर्याय हैं। भारत का इतिहास दिल्ली के इतिहास से अधिक विशाल है। अब समाज केन्द्रित इतिहास पढ़ाया जाएगा। किसी एक साम्राज्य का इतिहास पढ़ाया जाना अनुचित है। भारत के सभी राज्यों का इतिहास पढ़ाया जाना उचित होगा। यह बात शिक्षाविद और गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. बी.पी. शर्मा ने एनसीईआरटी की पुस्तकों पर उठ रहे विवाद को लेकर आयोजित चर्चा में कही। शर्मा ने कहा कि जैसे ही दिल्ली केन्द्रित इतिहास राष्ट्र केन्द्रित होता है प्रताप जैसे नायकों का पराक्रम स्थापित हो जाता है। वैसे भी वर्तमान इतिहास के 9वीं से 12वीं तक की पुस्तकों को राजनीतिक इतिहास से अधिक सांस्कृतिक इतिहास केन्द्रित किया गया।

मुगलकाल के हैं कई पहलू

इतिहासविद् डॉ. विवेक भटनागर ने कहा कि एनसीईआरटी की कक्षा 12 की ‘भारतीय इतिहास के कुछ विषय’ पुस्तक तीन भागों में प्रकाशित है। इसके दूसरे हिस्से के अध्याय चार में कृषि समाज और मुगल सम्राज्य का अध्याय है। इसमें मुगलकालीन समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था के साथ ही प्रशासन भी वर्णित है। ऐसे में मुगल के अध्याय को हटाने का प्रश्न ही नहीं उठता है। साथ ही मध्यकालीन भारत में दक्षिण भारत की संस्कृति और राजनीति पर ‘एक साम्राज्य की राजधानीः विजयनगर’ अध्याय से दक्षिण भारत के इस्लामिक इतिहास और उसकी संस्कृति का दिखाने का प्रयास किया गया है।

किताब के पुन:लेखन पर छिड़ा विवाद

इतिहास संकलन समिति के जिला मंत्री चैनशंकर दशोरा ने बताया कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) ने कक्षा 12वीं की इतिहास की पुस्तक का पुनःलेखन कर नए सिरे से प्रस्तुत किया। इसके बाद से इस बात पर विवाद छिड़ गया है कि पुस्तकों से किताबों से मुगल साम्राज्य से जुड़े अध्यायों को हटा दिया गया है या नहीं रखा गया है। इसके अतिरिक्त भी अन्य परिर्वतन किए गए हैं, जिन पर विवाद हो रहा है। इस विषय पर भारतीय इतिहास संकलन समिति, उदयपुर की ओर से एक चर्चा सत्र का आयोजन कर पुस्तकों की समीक्षा की गई।

भारतीय इतिहास के कुछ विषय

चर्चा सत्र में पुस्तक के अध्यायों का आधार बना कर विवाद के बिन्दुओं पर प्रश्न उत्तर का आयोजन किया गया। विशेष विवाद एनसीईआरटी की कक्षा 12 के लिए इतिहास की पुस्तक ‘भारतीय इतिहास के कुछ विषय’ पर चर्चा की गई। चर्चा में कोटा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ. एमएल कालरा ने कहा कि मुगल सिर्फ दो सौ वर्ष तक ही भारत में प्रभावी रहे। ऐसे में सिर्फ उनका इतिहास ही पढ़ाया जाए, ऐसी हठ भी ठीक नहीं है। अगर कोई पूर्व में गलती हुई है तो उसका अंशांकन किया जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है। राजकीय महाविद्यालय से सेवानिवृत्ति इतिहास के प्रोफेसर और वरिष्ठ इतिहासकार डाॅ. एम.पी. जैन ने कहा कि भारत में सत्ता के केन्द्र प्रत्येक काल अवधि में अनेक रहे। किन्तु सांस्कृतिक भारत की एकता अक्षुण्ण रही। ऐसे में भारत का सांस्कृतिक इतिहास ही सत्य इतिहास है। साम्राज्य और राज भी उसी का एक भाग है।

नायकों का हो सही चित्रण

वरिष्ठ पत्रकार राजेश कसेरा ने कहा कि राष्ट्रनायकों और अध्यात्मिक नायकों को सही चित्रण होना आवश्यक है। इनका गलत प्रस्तुतीकरण समाज के गौरव को आहत करता है। इससे युवा दिशाहीन हो सकते हैं। इतिहास की पुस्तक के विभिन्न अध्यायों में मुगलों का जिक्र मिलता है। अध्याय पांच में यात्रियों के नजरिये से भारत को दिखाया गया है जिसमें दसवीं से सत्रहवीं सदी के भारत का जिक्र है। वहीं अध्याय छह भक्ति और सूफी परंपराओं पर केंद्रित है। इतिहास के अध्यापक ओम प्रकाश शर्मा ने कहा कि एनसीईआरटी की भारत के पूर्व मुसलमान शासकों को पाठ्यक्रम से हटाने का विषय सिर्फ विवाद के लिए इसमें सभी पक्षों का समान स्थान दिया गया है। वहीं, एनसीईआरटी का तर्क है कि ऐसा छात्रों पर पाठ्यक्रम को व्यवस्थित और भारतीय संस्कृति को समझने के अनुरूप बनाया गया है।

मुगलों के अध्याय को हटाने को लेकर हो रही चर्चा गैरजरूरी

भारतीय इतिहास संकलन समिति के क्षेत्रीय संगठन मंत्री छगनलाल बोहरा ने कहा कि वर्तमान में देश में मुगलों के अध्याय को हटाने को लेकर हो रही चर्चा गैरजरूरी है। मुगल भारतीय इतिहास के नायक नहीं आक्रान्ता है उन्हें उसी अनुरूप इतिहास में स्थान मिलना चाहिए। इस चर्चा सत्र में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में सहायक आचार्य डाॅ. मनीष श्रीमाली ने कहा कि कक्षा 11वीं की पाठ्यपुस्तक थीम्स इन वल्र्ड हिस्ट्री भाग एक में व्यवस्थित रूप समय के आरम्भ से मानव के इतिहास और पुरातत्व का विश्लेषित किया गया है। मध्यकाल में इस्लामिक साम्राज्य के उदय से लेकर भारत में तुर्कों के प्रवेश तक को समेटा गया है। मंगोल को उनकी पृष्ठभूमि और तुर्कों को उनके विस्तार के साथ शामिल किया गया है। अंत में धन्यवाद ज्ञापन इतिहास संकलन समिति चित्तौड़ प्रांत के कोषाध्यक्ष गौरीशंकर दवे ने किया।

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