नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । अमेरिका एक नया बिल लेकर आया है, जो भारत, चीन समेत कुछ अन्य देशों से रूस से आयातित कच्चे तेल पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान करता है। इस बिल का समर्थन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किया है। इसका मकसद उन देशों को निशाना बनाना है जो रूस के साथ व्यापार जारी रखते हुए उससे तेल खरीद रहे हैं।
रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा है कि यदि कोई देश रूस से उत्पाद खरीदता है और यूक्रेन के समर्थन में कदम नहीं उठाता, तो उन देशों के अमेरिका में आने वाले उत्पादों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाएगा। ग्राहम ने कहा, “भारत और चीन रूस के तेल का लगभग 70% आयात करते हैं, जिससे वे रूस के युद्ध प्रयासों को आर्थिक मदद दे रहे हैं।”
अगस्त में अमेरिकी सीनेट में पेश किया जा सकता है बिल
माना जा रहा है कि यह विधेयक अगस्त में अमेरिकी सीनेट में पेश किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो इसे रूस को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की अमेरिका की रणनीति में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। इस विधेयक के पारित होने पर भारत और चीन पर गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना है, क्योंकि ये दोनों देश रूस से कच्चे तेल के सबसे बड़े छूट प्राप्त खरीदार हैं। इसके अलावा, इस अमेरिकी कदम के कारण भारत के फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और आईटी सेवाओं जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों पर भी टैरिफ लागू होने का खतरा पैदा हो सकता है।
भारत रूस का एक प्रमुख तेल आयातक है। यूक्रेन पर आक्रमण के तीसरे वर्ष में भारत ने लगभग 49 बिलियन यूरो मूल्य का कच्चा तेल रूस से खरीदा है। जबकि परंपरागत रूप से भारत अपने तेल की जरूरतें मध्य पूर्व से पूरी करता रहा है, फरवरी 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण के तुरंत बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल के बड़े पैमाने पर आयात की शुरुआत की थी।
बिल को अब तक 84 सीनेटरों का समर्थन
अमेरिका में इस विधेयक पर चर्चा ऐसे समय हो रही है जब भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते (Indo-US Trade Deal) को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया तेज हो रही है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने मंगलवार को कहा कि यह समझौता “बहुत करीब” है। वहीं, भारतीय प्रतिनिधिमंडल वाशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों के साथ लगातार वार्ता कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के बीच कृषि क्षेत्र से जुड़ी अहम मांगों को लेकर व्यापार वार्ता में कुछ अड़चनें भी आई हैं। यह प्रस्तावित बिल, जिसका सह-प्रायोजन रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने किया है, को अब तक लगभग 84 अन्य सीनेटरों का समर्थन भी प्राप्त हो चुका है।
‘अब बिल को आगे बढ़ाने का समय आ गया है’
इस विधेयक का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर देशों को रूसी तेल की खरीद बंद करने के लिए प्रेरित करना है, ताकि “मॉस्को की युद्ध अर्थव्यवस्था” को कमजोर किया जा सके और रूस को यूक्रेन के साथ शांति वार्ता के लिए दबाव में लाया जा सके। रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कल उनके साथ गोल्फ खेलते हुए इस बिल को आगे बढ़ाने का साफ इशारा दिया। ग्राहम ने कहा, “राष्ट्रपति ने पहली बार कहा कि अब आपके बिल को आगे बढ़ाने का समय आ गया है, और मैं उसी वक्त उनके साथ गोल्फ खेल रहा था।”
असल में, यह बिल मार्च में ही पेश किया गया था, लेकिन व्हाइट हाउस की कुछ आपत्तियों के चलते यह लंबित रह गया। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने इस बिल की भाषा में बदलाव कराने के लिए दबाव डाला था। उन्होंने ‘करेगा’ (Shall) की जगह ‘हो सकता है’ (May) शब्द इस्तेमाल करने की मांग की थी, जिससे बिल की मजबूती में कमी आई। इसके बाद, ग्राहम ने यूक्रेन का समर्थन करने वाले देशों के लिए एक अलग प्रस्ताव भी रखा, ताकि अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों की चिंताओं को कम किया जा सके। ग्राहम ने कहा, “हम राष्ट्रपति ट्रंप को एक समाधान देने वाले हैं।”
यदि यह विधेयक कानून बन जाता है, तो इससे चीन और भारत के साथ अमेरिका के व्यापारिक संबंधों में बड़े बदलाव आ सकते हैं। भारत के लिए अमेरिका सबसे बड़ा निर्यात बाजार होने के कारण, इस नीति से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव भी बढ़ सकते हैं। अमेरिका द्वारा भारत पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने से अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की कीमतें अचानक बढ़ जाएंगी, जिससे बिक्री में गिरावट आ सकती है। यह विशेष रूप से फार्मास्यूटिकल्स और ऑटोमोबाइल उद्योगों पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
रूस के तेल ने भारत को दी बड़ी राहत
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच, रूस ने भारत को कच्चा तेल रियायती दरों पर उपलब्ध कराया। इस सस्ते तेल के आयात ने भारत को आर्थिक, रणनीतिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण फायदे दिए हैं। सस्ते तेल ने न केवल देश के आयात बिल को कम किया, बल्कि रिफाइंड उत्पादों के निर्यात को भी बढ़ावा दिया और वैश्विक तेल की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद की। रूस के तेल की वजह से भारत ने मध्य पूर्व संकट और यूक्रेन युद्ध के दौरान घरेलू तेल कीमतों को स्थिर बनाए रखा।
24 फरवरी 2022 से 2 मार्च 2025 तक भारत ने रूस से लगभग 112.5 अरब यूरो (करीब 118 अरब डॉलर) मूल्य का कच्चा तेल आयात किया है, जो सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की रिपोर्ट पर आधारित है। युद्ध से पहले रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात 1% से भी कम था, जो 2023-24 में बढ़कर 35-45% तक पहुंच गया।
रूस का तेल भारत को सऊदी अरब और इराक जैसे पारंपरिक तेल आपूर्तिकर्ताओं की तुलना में सस्ता पड़ा, जिससे देश के आयात खर्च में भारी कटौती हुई। CREA और अन्य स्रोतों के अनुसार, भारत ने 2022 से 2025 के बीच रूसी तेल पर लगभग 10.5 से 25 अरब डॉलर तक की आर्थिक बचत की है।
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