नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। भारत और United Arab Emirates के बीच ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा समझौता हुआ है। प्रधानमंत्री Narendra Modi की UAE यात्रा के दौरान यह फैसला लिया गया कि अब Abu Dhabi National Oil Company भारत में 30 मिलियन बैरल रणनीतिक कच्चे तेल का भंडार रिजर्व रखेगी। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में संभावित रुकावटों को लेकर दुनिया भर में ऊर्जा सुरक्षा की चिंता बढ़ रही है।
क्या होता है स्ट्रैटेजिक ऑयल रिजर्व?
स्ट्रैटेजिक ऑयल रिजर्व यानी ऐसा विशेष तेल भंडार जिसे किसी आपात स्थिति, युद्ध, वैश्विक संकट या सप्लाई रुकने की हालत में इस्तेमाल किया जा सके। भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, उनके लिए यह रिजर्व बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
30 मिलियन बैरल तेल से कितने दिन चल सकता है काम?
भारत फिलहाल हर दिन करीब 5.5 मिलियन बैरल कच्चे तेल की खपत करता है। ऐसे में UAE द्वारा रिजर्व किए जाने वाले 30 मिलियन बैरल तेल से भारत की जरूरत लगभग 5 से 6 दिनों तक पूरी की जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तो यह भंडार भारत के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है।
भारत के रणनीतिक भंडार में होगी बड़ी बढ़ोतरी
फिलहाल भारत के पास लगभग 5.3 मिलियन टन का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद है। अब ADNOC के 30 मिलियन बैरल जुड़ने से देश की कुल रणनीतिक भंडारण क्षमता में लगभग 70 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने की उम्मीद जताई जा रही है। इससे भविष्य में तेल संकट या युद्ध जैसी परिस्थितियों में भारत की तैयारी और मजबूत होगी।
भंडारण का पूरा खर्च उठाएगा UAE
इस समझौते की खास बात यह है कि तेल का मालिकाना हक UAE और ADNOC के पास ही रहेगा। वहीं भारत की भूमिगत भंडारण सुविधाओं में इस तेल को रखने का पूरा खर्च भी UAE ही उठाएगा। इससे भारत को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाए बिना अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिलेगी।
भारत का तेल बैकअप होगा और मजबूत
रिपोर्ट्स के मुताबिक अगर मौजूदा रिफाइनरी स्टॉक और रणनीतिक भंडार को मिलाया जाए, तो भारत की कुल तेल बैकअप क्षमता काफी बढ़ सकती है। यह कदम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है।
पश्चिम एशिया संकट के बीच अहम समझौता
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच यह समझौता भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। इससे न सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि वैश्विक तेल संकट की स्थिति में भारत को अतिरिक्त सुरक्षा कवच भी मिलेगा।





