दुनिया भर के सभी महाद्वीपों में सिंचाई योग्य भूमि का 20 से 50 प्रतिशत हिस्सा इतना नमकीन हो गया है कि वो पूरी तरह से उपजाऊ नहीं बचा है, जिसके कारण, उन ज़मीनों में अपनी फ़सलें उगाने वाले लगभग डेढ़ अरब लोगों के लिये गम्भीर चुनौतियाँ पैदा हो गई हैं. यह जानकारी, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन (FAO) द्वारा बुधवार को जारी किये गए एक नए उपकरण या संसाधन का हिस्सा है जिसका नाम है – Global Map of Salt-Affected Soils, यानि नमक प्रभावित ज़मीनों का वैश्विक मानचित्र. Did you know soil is a living resource, home to more than 25% of our 🌎’s biodiversity? Soil biodiversity is key to global food security, we need to protect our soils! #SoilBiodiversity pic.twitter.com/unn5uV1HSV — FAO (@FAO) October 20, 2021 ये ज़मीनें कम उपजाऊ और कम उत्पादक हैं, जिसके कारण भुखमरी और निर्धनता के ख़िलाफ़ वैश्विक प्रयासों के लिये जोखिम उत्पन्न होने लगा है. इन ज़मीनों में पानी की गुणवत्ता और भूमि की जैव-विविधता भी कम होती है और, भूमि का क्षय बढ़ता है. खाद्य व कृषि संगठन, नए मानचित्र, 118 देशों और सैकड़ों डेटा शोधकर्ताओं को साथ लेकर चलने वाली इस परियोजना के ज़रिये, नीति-निर्माताओं को ज़्यादा बेहतर जानकारी उपलब्ध कराने की उम्मीद कर रहा है. ये जानकारी ख़ासतौर से, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और सिचाई परियोजनाओं के लिये सार्थक व प्रासंगिक होगी. यह मानचित्र व रिपोर्ट “नमक प्रभावित ज़मीनों पर वैश्विक संगोष्ठि” के पहले दिन बुधवार को जारी किये गए हैं. शुक्रवार तक चलने वाली तीन दिन की इस संगोष्ठि में पाँच हज़ार से ज़्यादा विशेषज्ञ शिरकत कर रहे हैं. विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के महानिदेशक क्यू डोंग्यू ने इस संगोष्ठि का उदघाटन करते हुए कहा कि दुनिया को, कृषि आधारित खाद्य प्रणालियों को और ज़्यादा कुशल, ज़्यादा समावेशी, ज़्यादा सहनशील और ज़्यादा टिकाऊ बनाने के लिये, बदलाव के नवाचार आधारित तरीक़े व रास्ते खोजने होंगे. बढ़ता जोखिम दुनिया भर में, कुल मिलाकर, 83 करोड़ 30 लाख हैक्टेयर से ज़्यादा नमक प्रभावित ज़मीनें हैं, जोकि पृथ्वी का लगभग 8.7 प्रतिशत हिस्सा है. इस तरह की ज़मीनें ज़्यादातर प्राकतिक रूप जल रहित इलाक़ों देखी जा सकती हैं या फिर अफ़्रीका, एशिया और लातीन अमेरिका के अर्द्ध जल रहित वातावरणों में. मगर नमक प्रभावित ज़मीनें बनने के लिये, मानव गतिविधियाँ भी ज़िम्मेदार हो सकती हैं, जिनमें कुप्रबन्धन, खाद व उर्वरकों का बहुत ज़्यादा या ग़लत तरीक़े से प्रयोग, वनों का अभाव, समुद्रों के जल स्तर में बढ़ोत्तरी इत्यादि. जलवायु परिवर्तन इस सबके साथ ही, जलवायु परिवर्तन का जोखिम भी बढ़ा रहा है. अध्ययनों व नमूनों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर सूखी ज़मीन का दायरा, इस सदी के अन्त तक 23 प्रतिशत तक बढ़ सकता है जोकि मुख्य रूप से विकासशील देशों में होगा. संगठन के अनुसार, पानी में घुलने योग्य नमक की बढ़ोत्तरी और उच्च सोडियम मात्रा में बढ़ोत्तरी की प्रक्रियाएँ, सर्वाधिक गम्भीर वैश्विक जोखिम हैं. इस समस्या का सामना करने के लिये, अनेक तरह के उपकरण व संसाधनों की आवश्यकता है. इनमें टिकाऊ भूमि प्रबन्धन तरीक़े अपनाने के बारे में जागरूकता फैलाने, टैक्नॉलॉजी के नवाचार तरीक़ों को बढ़ावा देने से लेकर, मज़बूत राजनैतिक प्रतिबद्धताएँ तक शामिल हैं. ज्ञान बाँटने के अवसर संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास लक्ष्य (SDG) हासिल करने के लिये, स्वस्थ और उपजाऊ ज़मीनें होना एक अनिवार्यता है. साथ ही, उपजाऊ ज़मीनें, खाद्य व कृषि संगठन (FAO) के चार बेहतर सिद्धान्तों के लिये भी आधार मुहैया कराती हैं: बेहतर उत्पादन, बेहतर पोषण, एक बेहतर पर्यावरण, और एक बेहतर जीवन, ताकि किसी को भी पीछे ना छोड़ा जा सके. नमक प्रभावित ज़मीनों पर वैश्विक संगोष्ठि का मुख्य उद्देश्य, ज़मीनों का लवणीकरण यानि नमक की मात्रा बढ़ने को रोकने, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकियों की बहाली के बारे में जानकारी व ज्ञान साझा करना है. साथ ही, नीति-निर्माताओं को खाद्य उत्पादकों, वैज्ञानिकों और ज़मीनी काम करने वालों के बीच सम्पर्क स्थापित कराना है. विश्व मृदा (मिट्टी) दिवस 5 दिसम्बर को मनाया जाता है और ये संगोष्ठि उसी को ध्यान में रखते हुए कुछ महीने पहले आयोजित की गई है. इस वर्ष का ये दिवस, नमक प्रभावित ज़मीनों के लिये समर्पित है और इसका मुख्य नारा है – “मिट्टी का लवणीकरण रोकें और ज़मीन की उत्पादकता बढ़ाएँ”. –संयुक्त राष्ट्र समाचार/UN News




