नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद आई दरार का अब दूसरे देश कैसे फायदा उठा रहे हैं, यह मामला कुछ ऐसा ही है । एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केन्द्रीय रक्षा मंत्री और गृह मंत्री को साथ लेकर देश की सेना को इस मुद्दे पर बारीकी से ध्यान देकर महत्वपूर्ण निर्णय लेने का सीधा अधिकार दे रहे हैं तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने सैन्य सामान को बैचने के लिए भी अनेक देश दोनों देशों के बीच के मनमुटाव को अवसर के रूप में ले रहे हैं। अब खबर आई है कि रूस ने इस तनावयुक्त मौके का फायदा उठाकर बड़ी चालाकी से अपना काम किया है।
दुनिया की सबसे कुशल मिसाइल
रूस ने एक आश्चर्यजनक निर्णय लेते हुए अचानक अत्याधुनिक एस-400 हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल चीन को सौंप दी। स्थानीय समाचार एजेंसियों के अनुसार, रूस ने चीन को यह मिसाइल उपलब्ध कराकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। एस-400 ट्रायम्फ को दुनिया की सबसे कुशल और घातक हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल के रूप में अपनी पहचान रखती है। इस मिसाइल का समग्र डिजाइन विभिन्न प्रकार के हवाई हमलों को विफल करने में काफी मदद करता है और सकारात्मक परिणाम भी देता है।
वही, जहां एक ओर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के करीबी चीन की रूस से बढ़ती ताकत कुछ चिंताजनक मुद्दों को जन्म दे रही है। क्योंकि अभी जिस तरह के हालात हैं, उनसे ये बात साफ है कि जब भी किसी एक के समर्थन में खड़ा होना होगा, चीन पाकिस्तान का ही साथ देगा।
2024 में हुआ था अरबों डॉलर का सौदा
इस संबंध में अब तक की उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 2014 में ही चीन से कई एस-400 ट्रायम्फ मिसाइलें खरीदने के लिए रूस के साथ अरबों डॉलर का सौदा हुआ था। इसके लिए समझौतों पर भी हस्ताक्षर किये गये। जिसके बाद अब 11 साल बाद उसी समझौते को लेकर दिलचस्प जानकारी सामने आई है, जहां रूस की ओर से चीन को ये मिसाइलें दी गई हैं। रूस के इस कदम से चीन के साथ देश के संबंधों में और मजबूती आना तय है और यह स्पष्ट है कि चीन ने अपनी राष्ट्रीय वायु सेना की ताकत बढ़ाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया है। जरूरत पड़ने पर हो सकता है कि वह इसका उपयोग करने के लिए इसे पाकिस्तान को दे दे।
समुद्री क्षेत्र में ताकत बढ़ाने की कोशिश
अभी चिंता इसलिए खास है, क्योंकि रूस ने चीन को यह वायु रक्षा प्रणाली ऐसे समय में पेश की है, जब भारत और फ्रांस ने भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर राफेल लड़ाकू विमानों की तैनाती के लिए भारतीय नौसेना के लिए करीब 64,000 करोड़ रुपये के सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। एक ओर जहां चीन समुद्री क्षेत्र में अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा था, वहीं भारत भी उस नजरिए से कदम उठाता नजर आया।
इस बीच, हालांकि चीनी मीडिया ने इस संबंध में कोई चर्चा नहीं की है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश अपनी हवाई और समुद्री सुरक्षा जरूरतों के लिए काफी हद तक रूस पर निर्भर है। पर भारत की मुख्य चिंता यही है कि रूस के हथियार चीन होकर पाकिस्तान को नहीं उपलब्ध करा दिए जाएं, जिसकी कि सबसे अधिक संभावना जताई जा रही है।




