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हिमाचल विश्वविद्यालय ने सेब साइडर सिरका के लिए तकनीक विकसित की

शिमला, 4 जुलाई (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश के नौनी इलाके में राज्य संचालित डॉ वाईएस परमार बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय ने सिरका के साथ-साथ बेस वाइन के उत्पादन के लिए निम्न ग्रेड और विकृत सेब का उपयोग करने के लिए एक तकनीक विकसित की है। विश्वविद्यालय के कुलपति परविंदर कौशल ने आईएएनएस को बताया कि नवीनतम तकनीक पारंपरिक तरीकों की समस्याओं को दूर करेगी, जो धीमी हैं और जिसके कारण खराब गुणवत्ता वाला सिरका होता है। विश्वविद्यालय ने शनिवार को एक डीएसटी परियोजना के तहत विश्वविद्यालय के खाद्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी के आधार पर सेब साइडर सिरका के उत्पादन के लिए शिमला स्थित एक खाद्य प्रसंस्करण कंपनी के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। विश्वविद्यालय ने एक बयान में कहा कि यह दूसरा स्टार्टअप है जिसने प्रौद्योगिकी शुल्क के रूप में 40,000 रुपये का भुगतान करके इस प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के लिए विश्वविद्यालय के साथ एक गैर-अनन्य लाइसेंस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस समझौते के तहत कंपनी साइडर विनेगर के निर्माण और बिक्री के लिए यूनिवर्सिटी की तकनीक का इस्तेमाल करेगी और उत्पाद के लेबल पर इसकी पुष्टि भी करेगी। प्रौद्योगिकी की व्याख्या करते हुए, खाद्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख के.डी. शर्मा ने कहा कि प्रौद्योगिकी सेब साइडर सिरका बनाने के पारंपरिक तरीकों का एक विकल्प है । इसे कृषि आय में सुधार के साथ-साथ कटे हुए सेब के पूर्ण उपयोग के लिए एक वैकल्पिक ²ष्टिकोण के रूप में भी लिया जा सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रौद्योगिकी में विश्वास रखने के लिए नंदा छाजता और यशवंत छाजता उद्यमियों की सराहना की और उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा विकसित कई अन्य तकनीकों और प्रक्रियाओं से अवगत कराया, जो उद्यम के लिए फायदेमंद हो सकती हैं। कुलपति ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में इसके कई स्वास्थ्य फायदों के कारण सेब के सिरके की मांग कई गुना बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि कंपनी को सेब से बहु-उत्पादों के उत्पादन और विकास का पता लगाना चाहिए जिससे फल का पूरा उपयोग किया जा सके। हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था पनबिजली और पर्यटन के अलावा बागवानी पर अत्यधिक निर्भर है, जिसका वार्षिक फल उद्योग 3,500 करोड़ रुपये से ज्यादा है। अकेले सेब कुल फल उत्पादन का लगभग 89 प्रतिशत है। बागवानी विभाग के अनुमान के अनुसार कोल्ड चेन की कमी से उपज का 25 प्रतिशत बर्बाद होता है। –आईएएनएस एसएस/आरजेएस

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