नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । केंद्र सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे पर खर्च कम करने का असर सीधे तौर पर इस वक्त देश की जीडीपी पर दिखाई दे रहा है। मांग की कमी के कारण विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादकता गिर गई है, जिसके चलते सामने आए आंकड़े बहुत डरा रहे हैं। भारत की दूसरी तिमाही में विकास दर गिरकर 5.4 फीसदी पर आ गई है। पिछले साल की समान तिमाही में विकास दर 8.1 फीसदी थी। आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक धीमी आर्थिक विकास दर का कारण विनिर्माण क्षेत्र का खराब प्रदर्शन है। वहीं इसे आप पिछले दो साल का सबसे निचला स्तर कह सकते हैं। अब देश की विकास दर धीमी होने को लेकर कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा है । पार्टी ने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि हकीकत मोदी और उनके समर्थकों के प्रचार और बड़े-बड़े दावों से बिल्कुल अलग हैं। मेक इन इंडिया की घोषणा के बाद भी मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ धीमी पड़ी है।
आयात और निर्यात में कमी आई है। यह घरेलू स्तर पर गंभीर कमजोरी का संकेत देता है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि उपभोक्ता खरीदारी में वृद्धि भी लड़खड़ा रही है। मोदी का आर्थिक विकास रिकॉर्ड पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहीं ज्यादा खराब है। उन्होंने कहा है कि यह तथाकथित नव भारत का कटु सत्य है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 की जुलाई-सितंबर तिमाही में कृषि क्षेत्र में जीवीए एक साल पहले के 1.7 फीसदी से बढ़कर 3.5 फीसदी हो गया। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र में जीवीए वृद्धि धीमी होकर 2.2 प्रतिशत रह गई, जबकि एक साल पहले यह वृद्धि 14.3 प्रतिशत थी। 2024-25 की अप्रैल-सितंबर अवधि में देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 6 प्रतिशत है, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में यह 8.2 प्रतिशत थी। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रही है ।
सेवा क्षेत्र और कृषि क्षेत्र की उत्पादकता में वृद्धि
बतादें कि यह वृद्धि दर पूर्व से लगाए गए सभी अनुमान 6.5% तक धीमी होने की उम्मीद से काफी कम है। पिछले साल की दूसरी तिमाही में विकास दर जबरदस्त 8.1% थी। जबकि इस साल की पहली तिमाही में विकास दर 6.7% थी. इससे मासिक और वार्षिक स्तर पर विकास दर को बड़ा झटका लगा है। दूसरी तिमाही में उपभोक्ता खर्च केवल छह प्रतिशत बढ़ा। पहली तिमाही में यह खर्च 7.4 फीसदी बढ़ गया था। दूसरी तिमाही में कंपनियों की बैलेंस शीट पर मुनाफे में गिरावट आई है। इसलिए विकास दर पर असर अपेक्षित था। वित्त मंत्रालय के प्रधान सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने दावा किया है कि हालांकि विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादकता गिर गई है, सेवा क्षेत्र और कृषि क्षेत्र की उत्पादकता में वृद्धि हुई है।
अगले छह महीने में यह विकास दर बढ़ेगी
यदि इसमें अलग-अलग क्षेत्रों को वर्गीकृत कर बात की जाए तो कृषि क्षेत्र की उत्पादकता बढ़कर 3.5% हो गई है, जबकि विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादकता गिरकर 2.2% हो गई है। खनन क्षेत्र की उत्पादकता शून्य से 0.01% नीचे है। बिजली, प्राकृतिक गैस, जल आपूर्ति आदि क्षेत्रों की उत्पादकता केवल 3.3 प्रतिशत है। निर्माण क्षेत्र की उत्पादकता 7.7 फीसदी बढ़ी है। पिछले साल इसी अवधि में यह 13.6% थी। केयर एड्स रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा ने कहा कि विकास दर उम्मीद से कम रही है, लेकिन अगले छह महीने में यह विकास दर बढ़ेगी, क्योंकि ग्रामीण इलाकों से मांग बढ़ेगी। केंद्र सरकार विकास दर बढ़ाने के लिए पूंजीगत व्यय बढ़ा सकती है। हालाँकि दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर केवल 5.4% थी, लेकिन यह दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक थी। इस तिमाही में भारत के प्रतिद्वंदी चीन की विकास दर सिर्फ 4.6 फीसदी रही है।
सभी देशों की विकास दर प्रभावी
इस सब के बीच केंद्र सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि खराब वैश्विक हालात के कारण सभी देशों की विकास दर प्रभावित हो रही है। राष्ट्रीय आय यानी सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आकलन का आधार वर्ष फिलहाल 2011-12 है। केंद्र सरकार इसमें संशोधन कर इसे आधार वर्ष 2022-23 बनाने की संभावना पर विचार कर रही है, इसके पीछे विचार यह है कि इससे अर्थव्यवस्था की सटीक तस्वीर उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। इस संबंध में सरकार की तैयारी पूरी हो चुकी है और फरवरी 2026 से नए संदर्भ वर्ष के आधार पर राष्ट्रीय आय के आंकड़े जारी किए जाएंगे। साथ ही श्रमिकों की संख्या के आंकड़े जनवरी 2025 से उपलब्ध होंगे। इससे बेरोजगारी दर को समझने में मदद मिलेगी।




