नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । दक्षिण भारत में विशेष रूप से कई त्योहार मनाए जाते हैं, पोंगल उनमें से एक है। यह तमिलनाडु का प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है। तमिल में पोंगल का अर्थ है उफान या विप्लव। पोंगल के दौरान लोग दूध में चावल उबालते हैं। तमिलनाडु में इस दिन को नये साल की शुरुआत माना जाता है। इस त्यौहार से जुड़ी कई मान्यताएं और परंपराएं हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं।
दरअसल, पोंगल त्योहार मकर संक्रांति से शुरू होता है जो चार दिनों तक मनाया जाता है। इस वर्ष यह उत्सव 14 से 17 जनवरी तक मनाया जाएगा। पोंगल त्योहार के पहले दिन को भोगी, दूसरे को सूर्य, तीसरे को मट्टू और चौथे को कानुम पोंगल कहा जाता है। इन चार दिनों के दौरान हर दिन अलग-अलग परंपराएं मनाई जाती हैं। लोग नाच-गाकर इस त्यौहार को मनाते हैं।
पोंगल इसलिए मनाया जाता है
प्रचलित कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव ने नंदी से कहा, ‘पृथ्वी पर जाओ और लोगों से कहो कि सभी को प्रतिदिन तेल लगाकर स्नान करना चाहिए और महीने में केवल एक बार भोजन करना चाहिए।’ पृथ्वी पर आते समय नंदी संदेश भूल गए और कहा, ‘मनुष्यों को प्रतिदिन भोजन करना चाहिए और दिन में एक बार तेल से स्नान करना चाहिए।’
नंदी की इस गलती के कारण महादेव क्रोधित हो गए और उन्होंने नंदी को श्राप देते हुए कहा, ‘तुम्हें पृथ्वी पर रहकर हल चलाना होगा और पृथ्वीवासी साल में एक दिन तुम्हारी पूजा करेंगे।’ इस श्राप के कारण ही पोंगल त्योहार मनाया जाता है, जिसमें बैलों की पूजा की जाती है।
पोंगल त्यौहार पर जल्लीकट्टू को भी जान लें
जल्लीकट्टू पोंगल त्योहार के दिन खेला जाता है। जल्लीकट्टू शब्द कालीकट्टू से लिया गया है। काली का अर्थ है सिक्का और कट्टू का अर्थ है बांधना। पुराने समय में, बैल के सींगों पर सिक्कों की एक गड्डी बांध दी जाती थी, और जो व्यक्ति बैल को वश में कर लेता था, उसे इनाम के रूप में वह गड्डी दे दी जाती थी। आज यह खेल पोंगल की पहचान बन गया है। बैलों को वश में करने की परंपरा आज भी जारी है।




