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Wednesday, March 18, 2026
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Hariyali Teej 2024: भाद्रपद माह में तीज मानाने की क्या है कहानी, जानें महत्व और पूजा विधि

हरियाली तीज के दिन हर इन सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं भगवान शिव पार्वती की निर्जला व्रत रखकर पूजा अर्चना करती हैं। लेकिन हरियाली तीज भाद्रपद माह में ही क्यों मनाई जाती है आइए जानें वजह।

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर हरतालिका तीज का पर्व मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस त्योहार के लिए यहीं तिथि और यहीं माह क्यों चुना गया। ये त्योहार भोलेनाथ और माता पार्वती को खास समर्पित है। आइए जानते हैं इस व्रत को करने की सही विधि के साथ-साथ इसकी विशेषताएं क्या है? 

कब है हरतालिका तीज ?

इस साल हरतालिका तीज पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 05 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 21 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 06 सितंबर को दोपहर 03 बजकर 21 मिनट पर होगा। ऐसे में हरतालिका तीज का व्रत 06 सितंबर को किया जाएगा। इस दिन सुहागिन महिलाएं अथवा कुंवारी कन्याएं भी भगवान शिव, माता पार्वती और उनके पूरे परिवार की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर घर के मंदिर में स्थापित करती हैं। माता का श्रृंगार किया जाता है। महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और उनकी कृपा प्राप्त करती हैं। 

हरतालिका तीज का महत्त्व 

आज के दिन सुहागिन महिलाएं अपने सुहाग को अखंड बनाए रखने के लिए हरतालिका तीज का व्रत करती हैं। इसके साथ ही अविवाहित कन्याएं अपने मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए इस दिन का व्रत करती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने ही सबसे पहले हरतालिका तीज का व्रत करते भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था। तब से ही इस व्रत को करने का सिलसिला चला आ रहा हैं। वहीं इस साल व्रत करके भोलेनाथ को प्रसन्न करना चाहती हैं तो इस दिन पूजा शुभ मुहूर्त में ही करें। ऐसा करने से आपको जल्दी फलप्राप्ति होती है। 

पूजा विधि 

आज के दिन आप अगर सुहागिन हैं तो आप को पूरा 16 श्रृंगार करना चाहिए। इसके साथ-साथ माता पार्वती, शिव जी और गणेश जी की मिट्टी की प्रतिमाएं बनाकर एक चौकी पर स्थापित करें। देवी पार्वती को वस्त्र, चुनरी और अन्य श्रृंगार के सामान से तैयार करें। फिर फूल, धूप, चंदन अर्पित करें। शिव जी को भांग, धतूरा और सफेद फूल अर्पित करें। पूजा के दौरान आपको निर्जला व्रत रखना चाहिए। उसके बाद रात में पूजा करने के बाद सुबह भगवान की मूर्ति का विसर्जन करके चना से अपना पारण करना चाहिए। 

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