नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। पांच दिवसीय दीपावली महोत्सव का चौथा दिन, यानी दिवाली के ठीक अगले दिन, भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत शक्ति और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक पर्व गोवर्धन पूजा मनाया जाता है। इसे अन्नकूट पूजा भी कहते हैं। इस दिन ब्रज के कण-कण में बसे भगवान कृष्ण की पूजा होती है, जो भक्तों को सभी दुखों से मुक्त कर उनका आशीर्वाद प्रदान करते हैं।इस साल यह महापर्व आज 22 अक्टूबर 2025, बुधवार को मनाया जाएगा।
क्यों शुरू हुई गोवर्धन पूजा? पढ़िए अद्भुत पौराणिक कथा
गोवर्धन पूजा मनाने के पीछे की कहानी सीधे श्रीमद्भागवत पुराण से जुड़ी है, जो भगवान श्रीकृष्ण की एक महान लीला का वर्णन करती है:
1. इंद्र का घमंड और कृष्ण की बाल-लीला
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय देवताओं के राजा देवराज इंद्र को अपने पद और शक्ति पर अत्यंत घमंड हो गया था। उस समय ब्रज के सभी लोग इंद्र को प्रसन्न करने के लिए एक विशाल पूजा की तैयारी कर रहे थे। तरह-तरह के पकवान (छप्पन भोग) बनाए जा रहे थे ताकि इंद्रदेव प्रसन्न होकर अच्छी वर्षा करें और ब्रज में अन्न की पैदावार अच्छी हो।
बालक कृष्ण ने माता यशोदा से पूछा कि यह पूजा किसकी हो रही है। माता ने बताया कि यह इंद्रदेव की पूजा है, जो वर्षा करते हैं।
2. गोवर्धन पर्वत की पूजा का सुझाव
इस पर लीलाधारी भगवान कृष्ण ने कहा कि वर्षा करना तो देवराज इंद्र का स्वाभाविक काम है, इसके लिए विशेष पूजा क्यों? अगर किसी की पूजा करनी है तो हमें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि हमारी गायें वहीं चरती हैं और उसी पर्वत की हरियाली से हमारा जीवन चलता है।
कृष्ण की बात मानते हुए सभी ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा छोड़ दी और उत्साह के साथ गोवर्धन पर्वत, गायों और प्रकृति की पूजा शुरू कर दी।
3. इंद्र का प्रकोप और गोवर्धन उद्धार
अपनी पूजा भंग होते देख, देवराज इंद्र क्रोधित हो उठे। उनका घमंड इतना बढ़ गया कि उन्होंने ब्रजवासियों को दंडित करने का फैसला किया। उन्होंने प्रलयंकारी मेघों को बुलाया और ब्रज पर भीषण मूसलाधार वर्षा शुरू करवा दी। चारों ओर जल ही जल हो गया और ब्रजवासियों का जीवन संकट में पड़ गया।
तभी ब्रजवासियों की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी छोटी उंगली (कनिष्ठा उंगली) पर पूरे गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। सभी ब्रजवासी और उनके पशु उस विशाल पर्वत के नीचे आकर सुरक्षित हो गए।
4. अहंकार का नाश और पर्व की शुरुआत
लगातार सात दिनों तक इंद्र ने वर्षा की, लेकिन पर्वत के नीचे सभी सुरक्षित रहे। अंततः, इंद्र को अपनी गलती का अहसास हुआ और उनका घमंड टूट गया। उन्होंने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी।
भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और उसी दिन से यह पर्व, भगवान की इस लीला की याद में, गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन छप्पन भोग बनाकर भगवान को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है और गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसकी पूजा की जाती है।




