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Friday, March 13, 2026
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जेपी आंदोलन के दो साथी आज बन गए विरोधी, जानिए लालू-नीतीश का राजनीतिक सफर

कभी एक-दूसरे के सबसे करीबी सहयोगी रहे दो नेता अब बिहार की राजनीति में एक-दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं। लालू यादव और नीतीश कुमार कभी एक-दूसरे के करीबी हुआ करते थे।

नई दिल्‍ली / रफ्तार डेस्‍क । 70 के दशक में जब देश आपातकाल के साये में था, तब लोकतंत्र की बहाली के लिए जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में उठे आंदोलन ने कई युवा नेताओं को जन्म दिया। उन्हीं में दो नाम थे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार। दोनों ने इस आंदोलन की आग में तपकर न केवल राजनीति में कदम रखा, बल्कि साथ-साथ सियासी सफर की शुरुआत की और ऊंचाइयों तक पहुंचे। लेकिन वक्त के साथ सत्ता की राजनीति ने उनके रिश्तों की दिशा बदल दी। कभी एक-दूसरे के लिए लाठियां खाने वाले ये नेता आज एक-दूसरे के धुर विरोधी बन चुके हैं। दोस्ती से शुरू हुई इनकी राजनीतिक यात्रा अब तीखी बयानबाजी और रणनीतिक टकराव में तब्दील हो चुकी है। बिहार की राजनीति में लालू और नीतीश की कहानी अब सिर्फ साथ चलने की नहीं, बल्कि अलग-अलग रास्तों पर चलकर आमने-सामने खड़े होने की मिसाल बन चुकी है। 

जेपी आंदोलन से निकले इन दोनों नेताओं की कहानी महज व्यक्तिगत रिश्तों की नहीं, बल्कि उस सियासी सफर की भी है जिसमें विचारधारा, सत्ता और परिस्थिति के बदलते समीकरणों ने दोस्ती को दुश्मनी में बदल दिया। कभी जो एक मंच पर थे, आज विरोधी ध्रुवों पर हैं। लालू और नीतीश की यह कहानी बिहार की राजनीति का ऐसा दस्तावेज बन गई है, जिसमें दोस्ती, दुश्मनी और सत्ता की पलटबाजी के तमाम रंग देखने को मिलते हैं। आइए जानें, कैसे एक दौर के दो संघर्षशील साथी वक्त के साथ सत्ता की लड़ाई में एक-दूसरे के मुकाबले खड़े हो गए।

जेपी आंदोलन में पड़ी दोस्ती की मजबूत नींव

1970 के दशक में जब पूरा देश आपातकाल की कगार पर था, तब बिहार में जेपी आंदोलन ने राजनीति की एक नई पीढ़ी को जन्म दिया। पटना विश्वविद्यालय के गलियारों में पहली बार लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की मुलाकात हुई। लालू की हाजिरजवाबी और नीतीश की रणनीतिक सोच ने दोनों को जेपी के बेहद करीबी बना दिया। 1974 में भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ पूरे देश में सड़कों पर लोग उतर रहे थे, और इन दोनों युवा नेताओं ने भी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस दौरान वे जेल गए, लाठियां खाईं और एक-दूसरे के लिए ढाल बनकर खड़े रहे।

25 जून 1975 को जब आपातकाल लागू किया गया, तो आंदोलन और भी उग्र हो गया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में यह आंदोलन दमदार हुआ और अंततः 1977 में आपातकाल समाप्त करा दिया गया। इसी दौर से दोनों नेताओं ने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की। जनता पार्टी की जीत ने लालू यादव और नीतीश कुमार को राजनीतिक मंच प्रदान किया, जहां लालू की लोकप्रियता और नीतीश की मेहनत ने उन्हें जनता दल में अहम स्थान दिलाया। इस तरह जेपी आंदोलन ने उनकी दोस्ती की नींव मजबूत की और राजनीति में कदम रखने का रास्ता खोल दिया।

लालू का उभार और दोस्ती में दरार की शुरुआत

1990 में जनता दल की जीत के बाद लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने। नीतीश कुमार ने उनके लिए विधायकों को जोड़ने में दिन-रात मेहनत की। लालू की सोशल इंजीनियरिंग, खासकर मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण ने उन्हें बिहार की सत्ता का बेताज बादशाह बना दिया। लेकिन सत्ता की गर्मी ने उनकी दोस्ती में दरार डालनी शुरू कर दी। लालू की जातीय राजनीति और नीतीश की विकास-केंद्रित सोच के बीच टकराव बढ़ता गया। 1994 में नीतीश ने जनता दल से अलग होकर समता पार्टी बना ली, जो सीधे लालू के खिलाफ एक खुला विद्रोह था। यह पहला मौका था जब उनकी दोस्ती सियासी दुश्मनी में बदल गई।

1996 में चारा घोटाले ने लालू की सियासी जमीन हिला दी। इस्तीफे के बाद उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया, जिसे नीतीश ने परिवारवाद का आरोप लगाते हुए आलोचना की। इसके बाद नीतीश ने ‘जंगलराज’ के खिलाफ सुशासन का नारा बुलंद किया और 1999 में बीजेपी के साथ गठबंधन किया। 2005 में नीतीश ने लालू-राबड़ी के लगभग 15 साल के शासन को उखाड़ फेंका। सड़क, बिजली और कानून-व्यवस्था में सुधारों ने उन्हें ‘सुशासन बाबू’ की उपाधि दिलाई। वहीं दूसरी ओर चारा घोटाले की सजा ने लालू की सियासी ताकत को कमजोर कर दिया। इस तरह दोनों की राजनीतिक राहें पूरी तरह से अलग हो गईं।

महागठबंधन बना और फिर दोस्ती की वापसी

2013 में नीतीश कुमार ने बीजेपी से अपने रिश्ते तोड़ दिए, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली हार ने उनकी राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर दिया। 2015 में बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने मिलकर महागठबंधन बनाया। यह गठबंधन दोस्ती की एक नई शुरुआत था, लेकिन सच तो यह था कि दोनों के बीच पुराना भरोसा अब खत्म हो चुका था। नीतीश फिर मुख्यमंत्री बने, लेकिन लालू के बेटों तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव के साथ उनका तालमेल पूरी तरह से नहीं बन पाया। 2017 में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर नीतीश ने महागठबंधन तोड़ दिया और बीजेपी के साथ फिर से हाथ मिलाया। इस कदम को लालू यादव ने ‘विश्वासघात’ बताया।

नीतीश कुमार की लगातार पलटबाजी का सिलसिला

नीतीश कुमार की राजनीतिक चालबाजियां कभी थमीं नहीं। 2022 में उन्होंने फिर से बीजेपी को छोड़कर RJD के साथ सरकार बनाई, जिसमें तेजस्वी यादव को उप मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन 2024 आते-आते नीतीश एक बार फिर एनडीए में लौट आए। लालू प्रसाद यादव ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि नीतीश पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता। वहीं तेजस्वी यादव ने उन्हें ‘पलटू राम’ कहकर निशाना बनाया। ये लगातार राजनीतिक उतार-चढ़ाव बिहार की जनता के लिए एक सियासी तमाशा बन चुके हैं, लेकिन इन सबके बीच नीतीश अपनी कुर्सी मजबूत बनाए रखने में कामयाब रहे हैं।

बिहार की सियासत से क्या सीख मिली ?

आज लालू प्रसाद यादव सक्रिय राजनीति से एक कदम पीछे हैं और उनकी पार्टी RJD की कमान अब तेजस्वी यादव के हाथों में है। वहीं, नीतीश कुमार 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए का मुख्य चेहरा बनकर सत्ता बचाने की जंग में हैं। लालू और नीतीश की राजनीतिक जंग का अगला अध्याय इस बार के चुनाव में तय होगा। नीतीश के अनुभव और चेहरे की मजबूती के बीच तेजस्वी की युवा ऊर्जा और अपील बिहार की जनता के लिए बड़ा चुनावी सवाल बनकर सामने है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि इस लंबे सफर ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही कोई स्थायी दुश्मन। जेपी आंदोलन की गरमाहट में शुरू हुई ये दोस्ती सत्ता की राजनीति में दुश्मनी में बदल गई, लेकिन बिहार की राजनीति में लालू और नीतीश का नाम हमेशा याद रखा जाएगा।

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