नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। बिहार विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। निर्वाचन आयोग ने पटना में बड़ी बैठक कर तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है। राष्ट्रीय दलों की मौजूदगी में चुनावी रणनीति पर चर्चा हुई जिसके बाद चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया गया है।
बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से एक चकाई विधानसभा सीट, जमुई लोकसभा क्षेत्र के तहत आती है। यह सीट लंबे समय से राजनीतिक विरासत का गढ़ बनी हुई है। यहां वर्षों से एक ही परिवार के सदस्य जीत दर्ज करते आ रहे हैं। हर चुनाव में यहां चौंकाने वाले समीकरण बनते हैं, जो सियासी पंडितों को भी हैरान कर देते हैं। चकाई अब फिर से राजनीतिक हलचल के केंद्र में है।
चकाई विधानसभा सीट, जो कि एक सामान्य श्रेणी की सीट है, बिहार के जमुई लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है। इस सीट की सबसे खास बात यह है कि यहां से अब तक एक ही परिवार के तीन सदस्य विधानसभा तक पहुंच चुके हैं। वर्षों से यह सीट एक राजनीतिक परिवार का मजबूत गढ़ बनी हुई है, जो इसे बिहार की सबसे दिलचस्प चुनावी सीटों में से एक बनाता है।
चकाई विधानसभा सीट की राजनीति पर वर्षों से एक ही परिवार का वर्चस्व रहा है। बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के बाद उनके बेटे नरेंद्र सिंह और फिर पोते सुमित कुमार सिंह भी इस सीट से विधायक बन चुके हैं।
झारखंड सीमा से सटी इस सीट की भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से अहम बनाती है। साथ ही, यह इलाका नक्सल प्रभावित भी रहा है, जिससे यहां की राजनीति और भी जटिल हो जाती है। चकाई न सिर्फ विरासत की राजनीति का उदाहरण है, बल्कि सुरक्षा और विकास जैसे अहम मुद्दों का भी केंद्र बना हुआ है।
इस सीट पर क्षेत्रीय दलों की पकड़
चकाई विधानसभा सीट ने वर्षों से दिलचस्प राजनीतिक उलटफेर देखे हैं। 2010 के विधानसभा चुनाव में यहां से झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के टिकट पर सुमित कुमार सिंह ने जीत दर्ज की थी, जो इस सीट पर क्षेत्रीय दलों की पकड़ को दर्शाता है। लेकिन 2015 में समीकरण बदले, और राजद (RJD) की उम्मीदवार सावित्री देवी ने बाजी मार ली। यह बदलाव चकाई की राजनीति में जनता के बदलते रुझान और स्थानीय मुद्दों की अहमियत को उजागर करता है।
सुमित कुमार की व्यक्तिगत पकड़ मजबूत
2020 के विधानसभा चुनाव में चकाई सीट पर एक बार फिर रोचक मुकाबला देखने को मिला। इस बार निर्दलीय उम्मीदवार सुमित कुमार सिंह ने कड़ी टक्कर में राजद की सावित्री देवी को महज 581 वोटों से हराकर जीत हासिल की। यह जीत न सिर्फ कांटे की टक्कर का संकेत थी, बल्कि सुमित की व्यक्तिगत पकड़ को भी साबित करती है। चुनाव जीतने के बाद उन्हें नीतीश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया, जिससे चकाई की राजनीतिक भूमिका और भी अहम हो गई है।
श्रीकृष्ण सिंह भी जीते चुनाव
बता दें कि, चकाई विधानसभा सीट पर राजनीतिक विरासत की गहरी छाप रही है। 1967 और 1969 में इस सीट से बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने जीत दर्ज की थी। उनके बेटे नरेंद्र सिंह ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 1985, 1990 और 2000 में चकाई से विधायक बने। वर्तमान में इस सीट का प्रतिनिधित्व उनके पोते सुमित कुमार सिंह कर रहे हैं, जो 2020 में निर्दलीय जीत कर नीतीश सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। चकाई की राजनीति तीन पीढ़ियों से इसी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
इस बार मुकाबल दिलचस्प होगा
चकाई विधानसभा सीट पर पिछली बार बेहद नजदीकी मुकाबला देखने को मिला था, जहां निर्दलीय उम्मीदवार सुमित कुमार सिंह ने राजद की सावित्री देवी को सिर्फ 581 वोटों से हराया था। ऐसे में इस बार भी यहां कड़ा और रोमांचक मुकाबला होने की पूरी संभावना जताई जा रही है। क्षेत्रीय समीकरण, पारिवारिक विरासत और स्थानीय मुद्दे एक बार फिर इस सीट को बिहार चुनाव की हाई प्रोफाइल सीटों में शामिल कर सकते हैं





