नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बिगुल बजा है वैसे वैसे केवटी विधानसभा सीट (क्रमांक 86) एक बार फिर राजनीति का गर्म मैदान बन चुकी है। यहां हर बार जीत-हार का अंतर मामूली रहा है और यही इसे सबसे हॉट सीट बनाता है। इस सीट पर पहले जनता दल, फिर राजद, और अब बीजेपी की बारी-बारी से कब्जा जमा रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि इस बार बाज़ी कौन मारेगा?
केवटी: इतिहास बोलता है, जनता बदलती है
केवटी सीट ने कभी भी एक पार्टी को लंबे समय तक टिकने नहीं दिया। 2020 में बीजेपी के मुरारी मोहन झा ने दिग्गज नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी (राजद) को 5,126 वोटों से हराया। 2015 में आरजेडी के फराज फातमी ने बीजेपी के अशोक कुमार यादव को पटखनी दी थी। और 2005 व 2010 में यही सीट बीजेपी के कब्ज़े में रही। यानी यहां सत्ता हर बार पलटती रही है जनता का मूड कब बदल जाए, कोई नहीं जानता।
जातीय समीकरण: केवटी में किसकी कितनी पकड़?
जनसांख्यिकी तस्वीर 2020 के मुताबिक
कुल मतदाता: 2.89 लाख
पुरुष: 1.54 लाख
महिलाएं: 1.35 लाख
तीसरे लिंग: 9
सेवा मतदाता: 245
यहां यादव, मुस्लिम, ब्राह्मण और दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। राजद अपने पारंपरिक MY समीकरण (मुस्लिम-यादव) पर दांव खेलेगी, जबकि बीजेपी ब्राह्मण-वैश्य-दलित समीकरण को साधने की कोशिश में है।
NDA बनाम गठबंधन
बीजेपी को फायदा है?
2020 की जीत, 2024 लोकसभा में जबरदस्त प्रदर्शन अशोक कुमार यादव ने 1.51 लाख वोटों से जीत दर्ज कीसंगठित कैडर और पीएम मोदी के चेहरे का असर आरजेडी के पास है। पुराने नेताओं की ज़मीनी पकड़ (जैसे सिद्दीकी और फराज फातमी) मुस्लिम-यादव वोट बैंक, सरकार विरोधी लहर को भुनाने का मौका, वीआईपी और निर्दलीयों की एंट्री से बिगड़ सकते हैं समीकरण, हालांकि,असली टक्कर बीजेपी और आरजेडी के बीच ही है, लेकिन वीआईपी पार्टी और कुछ स्थानीय निर्दलीय उम्मीदवार समीकरणों को उलझा सकते हैं। 2020 में निर्दलीय योगेश रंजन को भी 3,304 वोट मिले थे, जो हार-जीत का अंतर प्रभावित कर सकते हैं।
बिहार की सियासत में कई सीटें चर्चा में रहती हैं, लेकिन जब बात केवटी विधानसभा (सीट संख्या 86) की होती है, तो मुकाबला हमेशा ही हाई-वोल्टेज होता है। जीत और हार के फासले इतने मामूली होते हैं कि प्रत्याशी की सांसें चुनाव परिणाम तक अटकी रहती हैं। आइये एक नज़र डालते हैं, केवटी सीट के चुनावी इतिहास और बदलते राजनीतिक समीकरणों पर
2020 का चुनाव: बीजेपी ने मारी बाज़ी, लेकिन मुकाबला था तगड़ा
विजेता: मुरारी मोहन झा (भाजपा)
वोट मिले: 76,372
निकटतम प्रतिद्वंद्वी: अब्दुल बारी सिद्दीकी (राजद)
वोट मिले: 71,246
जीत का अंतर: 5,126 वोट
तीसरे स्थान पर: योगेश रंजन (निर्दलीय) – 3,304 वोट (2.02%)
बीजेपी ने यह सीट तो जीती, लेकिन आरजेडी की चुनौती को कम नहीं आंका जा सकता। सिद्दीकी जैसे दिग्गज को हराना आसान नहीं था, लेकिन वोटों का अंतर बताता है कि मुकाबला कितना करीब था।
2015 का चुनाव: आरजेडी की वापसी
विजेता: फराज फातमी (राजद)
वोट मिले: 68,601
दूसरे स्थान पर: अशोक कुमार यादव (भाजपा) – 60,771 वोट
जीत का अंतर: 7,830 वोट (5.51%)
2015 में महागठबंधन की लहर और लालू प्रसाद यादव की पकड़ का फायदा आरजेडी को मिला। फराज फातमी ने बीजेपी को कड़ी शिकस्त दी थी।
केवटी सीट का ऐतिहासिक लेखा-जोखा:
वर्ष विजेता पार्टी
2010 अशोक कुमार यादव भाजपा
2005 (अक्टूबर) अशोक कुमार यादव भाजपा
2005 (फरवरी) अशोक कुमार यादव भाजपा
2000 गुलाम सरवर राजद
1995 गुलाम सरवर जनता दल
1990 गुलाम सरवर जनता दल
1985 कलीम अहमद कांग्रेस
1980 शमाएले नबी कांग्रेस
1977 दुर्गादास ठाकुर जनता पार्टी
फिर कौन होगा ‘केवटी का किंग’
गुलाम सरवर ने लगातार तीन बार इस सीट पर जीत हासिल की (1990, 1995, 2000)।अशोक कुमार यादव ने 2005 और 2010 में लगातार जीत दर्ज कर बीजेपी की पकड़ बनाई। 2015 में सत्ता बदली, और फिर 2020 में फिर से बीजेपी की वापसी हुई।
2025: फिर कौन होगा ‘केवटी का किंग’?
इतिहास बताता है कि केवटी कभी भी किसी एक पार्टी की बपौती नहीं रही। यहां जनता बार-बार अपना मूड बदलती है और परफॉर्मेंस और समीकरण के आधार पर ही वोट देती है।केवटी सीट का मिज़ाज बदलाव पसंद है। यहां जीत किसी पार्टी की गारंटी नहीं जिसने समीकरण सही साधा, जीत उसी की होगी। 2025 में भी कांटे की टक्कर तय है, और फैसला करेगा वो बटन जो हर बार इतिहास लिखता है।





