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Bihar Election 2025: बिहार में बाहुबली नेताओं की कब हुई थी एंट्री, जानें सबसे पहले किस नेता ने लड़ा था चुनाव

बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं का इतिहास काफी पुराना है। अब तक कई नेताओं ने बाहुबली के तौर पर अपनी ताकत और जातीय समीकरण के दम पर विधानसभा में जगह बनाई।

नई दिल्‍ली, रफ्तार डेस्‍क । बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं का इतिहास रहा है, जो अपराध और राजनीतिक दबदबे का मेल हैं। ये नेता अपने क्षेत्र में सत्ता के लिए हिंसा और दबाव का सहारा लेते रहे हैं। हाल के वर्षों में राज्य में कानून-व्यवस्था सुधारने की कोशिशें भी तेज हुई हैं।

बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं की शुरुआत वीर बहादुर सिंह से मानी जाती है, जिन्होंने 1980 में जगदीशपुर से विधायक बनकर अपनी ताकत और जातीय समीकरण का असर दिखाया। उन्होंने कोइरी और यादव जैसे प्रमुख समुदायों का समर्थन जुटाकर बाहुबली प्रभाव के साथ विधानसभा में मजबूत पकड़ बनाई। उनके राजनीतिक सफर ने भोजपुर समेत बिहार के कई इलाकों में दबंग नेताओं के उदय की राह खोल दी।

कौन था पहला बाहुबली विधायक?

बिहार में बाहुबली विधायक को लेकर कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि वीर बहादुर सिंह सबसे पहले ऐसे नेता थे, जो 1980 में जगदीशपुर विधानसभा सीट से विधायक बने। उनकी जीत से बाहुबली राजनीति की शुरुआत मानी जाती है।

वीर बहादुर सिंह का जन्म बक्सर के बगेन गांव में एक बड़े जोतदार परिवार में हुआ था। उनके पिता की नक्सलियों द्वारा हत्या के बाद उन्होंने हथियार उठाए। शुरू में नक्सलियों से लड़ाई में लगे वीर बहादुर जल्द ही अपने क्षेत्र के दबंग और जातीय नेता के रूप में उभरे, जिन्‍हें राजपूत समुदाय ने नायक माना।

पहली बार कब लड़ा था चुनाव ?

1977 के पहले विधानसभा चुनाव में वीर बहादुर सिंह ने जगदीशपुर से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। अपने बाहुबल और क्षेत्रीय प्रभाव के बावजूद वे करीब 4 हजार वोटों से हार गए। यह हार उन्हें निराश नहीं कर सकी, बल्कि भविष्य की तैयारी का अवसर बनी।

किसको हराकर दर्ज की जीत?

1980 के मध्यावधि चुनाव में वीर बहादुर सिंह ने रणनीति बदली। उन्होंने अपने बाहुबल के साथ-साथ जातीय समीकरण पर भी ध्यान दिया। यादव और कोइरी समुदाय की संख्या बराबर होने के कारण, अक्सर जीत उनके झुकाव पर निर्भर करती थी, जिसे उन्होंने समझदारी से भुनाया।

बीजेपी नेता को हराकर बने विधायक 

1980 के चुनाव में वीर बहादुर सिंह ने कोइरी बहुल इलाकों में जाकर समर्थन जुटाया। इस जातीय समर्थन और अपने बाहुबल की ताकत से उन्हें कुल 19,796 वोट मिले और वे जनता पार्टी के हरि नारायण सिंह को करीब 4 हजार वोटों से हराकर विजयी बने।

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