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राक्षस संवत के नाम से जाना जाएगा नव संवत्सर 2078, विलुप्त हुआ आनंद संवत

डाॅ. प्रदीप कुमावत चैत्र शुक्ला एकम जिसे वर्ष प्रतिपदा भी कहा जाता है, भारतवर्ष की परंपराओं का सबसे प्रतिष्ठित स्वरूप है। काल गणना की दृष्टि से पूर्णतः वैज्ञानिक यह दिन बसंत के वैभव का, नव चैतन्य, नव जीवन का प्रारंभ है। यही वह मास है जिसमें प्रकृति अपना नव कोंपलों से शृंगार करती है। बड़ी नवरात्रि की स्थापना का दिन भी यही है, पृथ्वी के प्रथम राष्ट्र भारतवर्ष का उदय और प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक का भी यदि दिवस माना गया है। अभी कुछ शोधकर्ताओं ने भगवान राम के अयोध्या लौटने का समय भी रामनवमी को माना है, हालांकि यह एक और शोध का विषय है। चिंतकों के आधार पर द्वापर युग में युधिष्ठिर ने धर्म ध्वजा फहरा कर युधिष्ठिर संवत का प्रारंभ किया। कलयुग में महाराजा विक्रमादित्य ने अपने पराक्रम से संपूर्ण पृथ्वी पर अपनी धर्म ध्वजा को फहराया। उनके समय में किसी भी व्यक्ति पर एक पैसे का भी ऋण नहीं था। अतः विक्रमादित्य को सम्मान देने इस संवत्सर का नाम विक्रम संवत किया गया। यह कालगणना सूर्य चंद्र दोनों की गति पर आधारित विश्व की सबसे व्यापक काल गणना है जिसे आदिकाल में भारत वर्ष के ऋषि मुनियों ने स्थापित किया। हमारे पूर्वजों ने आकाशगंगा को भेद कर अणु तक की गणना प्रभावी ढंग से की। इसलिए भारतीय कालगणना सूक्ष्मतम से विराट की ओर ले जाकर पूरे वर्ष पर्यंत में एक पल की भी त्रुटि नहीं दिखाती। स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय पंचांग निश्चित करने के लिए प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. मेघनाद साहा की अध्यक्षता में कैलेंडर रिफॉर्म कमिटी का गठन किया गया था। वर्ष 1952 में जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई उसमें विक्रम संवत को ही राष्ट्रीय संवत बनाने की सिफारिश की गई थी। यह संवत ईस्वी संवत से 57 साल पुराना था, लेकिन उस समय की अंग्रेजी मानसिकता के चलते उस समय की सरकार ने डाॅ. मेघनाद साहा के इस सुझाव को परे कर शक संवत को राष्ट्रीय संवत घोषित कर दिया। अंग्रेजी कैलेंडर में कई प्रकार की त्रुटियां हैं। रोमन कैलेंडर में भी 304 दिन बताए गए हैं जो कि ग्रहों की गति से मेल नहीं खाता। पूरी तरह से नक्षत्रों, सूर्य और चंद्रमा की गति को वैज्ञानिक आधार मानकर जो काल गणना की गई है वह विक्रम संवत है। यह हर दृष्टि से हिंदू मास चैत्र (चित्रा नक्षत्र), वैशाख (विशाखा नक्षत्र), ज्येष्ठ (जेष्ठा नक्षत्र), आषाढ़ (आषाढ़ नक्षत्र), श्रावण (श्रावण नक्षत्र), भाद्रपद (भाद्रपद नक्षत्र), आश्विन मास (अश्विनी नक्षत्र), कार्तिक मास (कृतिका नक्षत्र), पौष (पुष्य नक्षत्र), माघ (मघा नक्षत्र) और फाल्गुन (फाल्गुनी नक्षत्र) अद्वितीय कालगणना का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। पूरी दुनिया को गणित समझाने वाले भारतीय वैज्ञानिकों को यथोचित आदर मिल जाता तो आज पूरी दुनिया में हमारे इसी पंचांग को सर्वमान्य रूप से माना जाता, लेकिन दुर्भाग्य कि हमारे देश में ही इसको पूरी तरह से मान्यता देने के बजाय इसे दरकिनार किया गया। बिना आमंत्रण लाखों साधु अचानक प्रकट हो जाते हैं वस्तुतः आज भी हमारे जीवन का आधार यही पंचांग है। हालांकि, हम दोहरा जीवन जी रहे हैं। हम अंग्रेजी कैलेंडर को वैश्विक स्तर पर साम्यता के लिए अपने जीवन में अपना रहे हैं, लेकिन मूल में हमारे व्रत-उपवास-त्यौहार सब कुछ इसी पंचांग की तिथियों पर आधारित है। हमारे पूर्वज सृष्टि के भेद को समझ चुके थे। उन्हें सूर्य और चंद्रमा की दूरी को नापने का आधार तक पता था। उन्होंने हजारों वर्षों पहले कालगणना के रूप में स्थापित कर दिया था। हमारे देश के गांव में, शहरों में, सैकड़ों मील दूर विदेशों में, हर व्यक्ति पंचांग को जानता है। इसका साक्षात उदाहरण है कि बिना आमंत्रण, बिना सूचना के भी विराट कुम्भ, दीपावली, होली, सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण आदि अवसरों पर पवित्र सरोवर-सलिला पर श्रद्धालु पवित्र स्नान के लिए जुटते हैं। हमें जिन साधु संगत को जीवन में इतनी बड़ी संख्या में देखने को मिलता है, ऐसे हिमालय की कंदराओं में तपस्यालीन महात्माओं को कौन बताने जाता है कि अमुक दिन कुम्भ है। यह पंचांग ही है जिसने बरसों पहले गणना कर यह बता रखा है कि कुम्भ कब होगा। ऐसे में हमें इस पर गर्व क्यों नहीं होना चाहिए। महज 15 दिनों का आनंद नाम का संवत भारतीय पंचांग जिसमें तीन प्रकार के कालखंड माने गए हैं। प्रथम 20 ब्रह्मा के, दूसरे 20 विष्णु के और तीसरे 20 शिव के माने गए हैं। अभी शिव के लिए वर्ष चल रहे हैं जिसमें से पिछला वर्ष प्रमादी वर्ष था और उसने जी-भर के प्रमाद किया। करोना जैसी महामारी से हमें जूझना पड़ा। इस वर्ष आनंद नाम का संवत इसी अमावस्या से विलुप्त हो गया। कालगणना के अनुसार आनंद नाम का यह संवत 15 दिनों तक के कालखंड जितना ही माना गया। अब राक्षस नाम का संवत मंगलवार से प्रारंभ हो रहा है। यह मंगल से प्रारम्भ हो रहा है। सबके जीवन में मंगल करेगा। इन्हीं आशाओं और अपेक्षाओं के साथ एकबार पुनः नव संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाइयां। (लेखक, अखिल भारतीय नववर्ष समारोह समिति के राष्ट्रीय सचिव हैं।)

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