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Monday, April 6, 2026
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श्रीलंकाई प्रधानमंत्री ने पद पर बने रहने की बात दोहराई

कोलंबो, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। गंभीर आर्थिक संकट से जूझने के कारण पद छोड़ने के लिये अंदरूनी और बाहरी दबाव झेल रहे श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने फिर दोहराया है कि वह अपनी कुर्सी नहीं छोड़ेंगे। महिंदा राजपक्षे ने मंगलवार को अपनी पार्टी के प्रांतीय स्तर के सदस्यों को संबोधित करते हुये कहा कि घबरायें नहीं, मैं पद नहीं छोडूंगा। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति जे आर जयवर्धने के सिंघली और तमिल समुदाय के बीच जारी जंग को खत्म करने के लिये 1987 में भारत-श्रीलंका शांति समझौता किया गया था। इसी समझौते का नतीजा है प्रांतीय परिषद। प्रांतीय परिषद के सदस्यों ने राजपक्षे से प्रधानमंत्री पद न छोड़ने का आग्रह करते हुये एक प्रस्ताव पारित किया है। राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आये हैं और उनके आधिकारिक आवास का मुख्य द्वार बाधित कर दिया है। राष्ट्रपति दो अप्रैल से ही सुरक्षित स्थान पर हैं। सभी सांसद, चाहे वे सरकार के पक्ष में हों या विपक्ष में, सर्वदलीय अंतरिम सरकार बनाने का आग्रह कर रहे हैं। महिंदा राजपक्षे ने कहा कि वह अंतरिम सरकार के पक्ष में हैं लेकिन सिर्फ इसी शर्त पर कि प्रधानमंत्री वह ही रहें। देश में विदेशी मुद्रा भंडार के लगभग खाली होने से हर चीजों के दाम में आयी तेजी तथा किल्लत से जूझ रहे लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर आ गये हैं और सरकार को हटाये जाने की लगतार मांग कर रहे हैं। विश्व बैंक की एक टीम ने मंगलवार को राष्ट्रपति से मुलाकात की और श्रीलंका को 60 करोड़ डॉलर की वित्तीय मदद देने पर अपनी सहमति जताई। विश्व बैंक 40 करोड़ डॉलजर की पहली किस्त जल्द ही जारी करेगा। भारत ने भी श्रीलंका को इस साल अब तक ढाई अरब डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान की है और ईंधन खरीदने के लिये अतिरिक्त 50 करोड़ डॉलर देने का वादा किया है। श्रीलंका के पास मात्र 1.6 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है जबकि विदेशों से इस साल लिया गया ऋण सात अरब डॉलर से भी अधिक है, इसी वजह से केंद्रीय बैंक ने ऋण की किस्त चुकाने में असमर्थतता जताई है। श्रीलंका के विदेश मंत्री ने गत शनिवार को इस मसले पर आईएमएफ के साथ की गई बातचीत को सार्थक बताया। चीन ने लेकिन आईएमएफ के पास जाने की श्रीलंका की नीति को पसंद नहीं किया है और कहा है कि वह श्रीलंका को जो वित्ताय मदद मुहैया कराने जा रहा था, वह प्रक्रिया इससे प्रभावित हो गई है। श्रीलंका में दवाओं की भारी कमी है और डॉक्टरों ने इसके लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन, विदेशों तथा अपने अप्रवासी नागरिकों से मदद की गुहार लगाई है। भारत ने इस दिशा में पहल करते हुये करीब 101 तरह की दवायें श्रीलंका भेजी हैं। –आईएएनएस एकेएस/एसकेपी

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