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अलग मातृभूमि चाहने वाले चीन के इस्लामवादियों ने तालिबान के अफगानिस्तान अधिग्रहण का किया स्वागत

नई दिल्ली, 11 सितम्बर (आईएएनएस)। अफगानिस्तान में अंतरिम सरकार बनाने के दौरान चीन ने कट्टरपंथी तालिबान से संपर्क जरूर स्थापित किया है, लेकिन अन्य आतंकी संगठनों को लेकर चिंता बनी हुई है, जो इस क्षेत्र का इस्तेमाल नृशंस कृत्यों को अंजाम देने के लिए कर सकते हैं। बीजिंग की मुख्य चिंता पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) है – एक उइगर उग्रवादी समूह – जो अफगानिस्तान में और उसके आसपास अपने नेटवर्क का विस्तार कर रहा है। न्यूजवीक ने ईटीआईएम के एक प्रवक्ता के हवाले से कहा, संयुक्त राज्य अमेरिका एक मजबूत देश है। इसकी अपनी रणनीति है और हम आज अफगानिस्तान में इस युद्ध से अमेरिकी सरकार की वापसी को देखते हैं, जो कि चीन का सामना करने के साधन के रूप में भारी आर्थिक नुकसान उठा रहा है, जो पृथ्वी पर सभी मानवता और धर्म का दुश्मन है। प्रवक्ता ने कहा, हमारा मानना है कि चीन के प्रति संयुक्त राज्य अमेरिका के विरोध से न केवल तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी, बल्कि तुर्किस्तान के लोगों को भी लाभ होगा। ईटीआईएम की ओर से चेतावनी तब दी गई है, जब तालिबान द्वारा चीन को आश्वासन दिया गया है कि आतंकी संगठनों को अपनी गतिविधियों के लिए अफगानिस्तान का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। कई विदेश नीति पर नजर रखने वालों की राय है कि तालिबान का उन कई आतंकी संगठनों पर बहुत कम नियंत्रण होगा, जिन्होंने अफगानिस्तान को अपना आधार बनाया है और ईटीआईएम चिंता का एक प्रमुख कारण बन सकता है। ईटीआईएम चीन की मुख्य चिंता क्यों है? अल जजीरा के अनुसार, बीजिंग ईटीआईएम पर 1990 के दशक में कई मौतों के कारण हिंसक आतंकवाद करने का आरोप लगाता रहा है, लेकिन इन दावों का समर्थन करने के लिए बहुत कम सबूत हैं। वहीं ईटीआईएम ने उइगरों के खिलाफ चीनी अत्याचारों को प्रदर्शित करना शुरू कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ईटीआईएम का शिनजियांग, चीन और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के साथ-साथ चित्राल, पाकिस्तान को लक्षित करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय एजेंडा है, जो चीन, पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय राष्ट्रों के लिए खतरा है। रिपोर्ट के अनुसार, ईटीआईएम में वर्तमान में कई सौ सदस्य हैं, जो मुख्य रूप से बदख्शां और पड़ोसी अफगान प्रांतों में स्थित हैं। ईटीआईएम क्या है? आतंकवादी गुट ईटीआईएम, जिसके अल कायदा जैसे अन्य आतंकी संगठनों के साथ संबंध हैं, को 2002 में संयुक्त राष्ट्र की आतंकी सूची में रखा गया था। हालांकि, नवंबर 2020 में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के तहत अमेरिकी प्रशासन ने अमेरिकी आतंकवाद पदनाम सूची से संगठन को हटा दिया, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन ने कहा, उइगर संगठनों द्वारा इस कदम का स्वागत किया गया। ओआरएफ के अध्ययन में कहा गया है, चीन ने उइगरों के खिलाफ अपनी लड़ाई को अपनी मुख्य आतंकवाद चुनौती के रूप में पहचाना है और इसने अपने भूगोल से परे भी इससे निपटने के लिए उपकरणों और राज्य की क्षमता को तैनात किया है। ओआरएफ के अध्ययन में यह भी कहा गया है कि हाल ही में, 2017 में ईटीआईएम सेनानियों को तथाकथित इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस या अरबी में दाएश) के साथ गठबंधन करते देखा गया है। ईटीआईएम समय-समय पर चीनियों पर आतंकी हमले करता रहा है। अफगानिस्तान में मौजूदा आतंकी संगठन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि करीब 8,000 से 10,000 विदेशी आतंकी लड़ाकों ने अफगानिस्तान को अपना अड्डा बना लिया है। ये लड़ाके मध्य एशिया, रूसी संघ के उत्तरी काकेशस क्षेत्र, पाकिस्तान और चीन के झिंजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र से आए हैं। इतना ही नहीं, तालिबान भी एक सजातीय चेहरा पेश नहीं करते हैं। एक विश्लेषक ने इंडिया नैरेटिव को बताया, तालिबान के भीतर कई गुट हैं और अब सरकार बनने से इन गुटों के बीच अंदरूनी कलह और तेज होने की उम्मीद की जा सकती है। तालिबान की अंतरिम सरकार का नेतृत्व पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के समर्थन से संयुक्त राष्ट्र द्वारा ब्लैक लिस्टेड मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद के नेतृत्व में किया जाएगा, जिसकी घोषणा हाल ही में हुई है। तालिबान के भीतर दरारें दिखाई दे रही हैं, क्योंकि शुरूआत में यही संभावना थी कि तालिबान का सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर सरकार का नेतृत्व करेगा। हालांकि, बरादर को पदावनत कर दिया गया है और अब उसे सर्वोच्च पद देने के बजाय उपनेता यानी कार्यवाहक उप-प्रधानमंत्री बनाया गया है। विश्लेषकों का मानना ??है कि निकट भविष्य में अफगानिस्तान में स्थिति और खराब होने की संभावना है। (यह आलेख इंडिया नैरेटिव डॉट कॉम के साथ एक व्यवस्था के तहत लिया गया है) –इंडिया नैरेटिव एकेके/एएनएम

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