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Tuesday, April 7, 2026
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सुरक्षा परिषद में महासचिव – शान्ति निर्माण प्रक्रियाओं में समावेशन पर बल

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि युद्ध के बाद के हालात से उबरने और स्थाई शान्ति प्राप्ति के लिये यह ज़रूरी है कि समाजों के पुनर्निर्माण में समावेशन पर बल दिया जाए. उन्होंने मंगलवार को सुरक्षा परिषद में विश्व नेताओं, राजदूतों और अन्य अहम हस्तियों की एक बैठक को सम्बोधित करते हुए यह आग्रह किया है. महासचिव ने सुरक्षा परिषद में विविधता, राज्यसत्ता निर्माण और शान्ति की तलाश के विषय पर केनया द्वारा आयोजित एक खुली चर्चा को सम्बोधित किया. अक्टूबर महीने के लिये सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता केनया के पास है. महासचिव गुटेरेश ने कहा, “हिंसक संघर्ष की भयावहता से उभर रहे देशों के लिये, और भविष्य की ओर देख रहे, निसन्देह सभी देशों के लिये, विविधता को एक ख़तरे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.” ICYMI: "When we open the door to inclusion and participation, we take a giant step forward in conflict-prevention and peacebuilding", said @antonioguterres at the Security Council open debate this morning on Diversity, Statebuildilng & the Search for Peace https://t.co/zUadWTj7Ye pic.twitter.com/DeHCrTFLg4 — UN Political and Peacebuilding Affairs (@UNDPPA) October 12, 2021 “यह शक्ति का एक स्रोत है.” यूएन प्रमुख ने ज़ोर देकर कहा कि शान्ति किसी काग़ज़ के टुकड़े में नहीं, बल्कि लोगों में मिलती है. उन्होंने सचेत किया कि विषमताओं और कमज़ोर शासन प्रणाली से, असहिष्णुता व चरमपंथ के उभरने के लिये जगह बनती है, जिससे हिंसक संघर्ष की चिंगारी भड़क सकती है. इसके विपरीत, समावेशन का एक अलग ही प्रभाव होता है. महासचिव के मुताबिक़, समावेशन और भागीदारी का दरवाज़ा खोलने से, हिंसक संघर्ष की रोकथाम और शान्तिनिर्माण की दिशा में एक विशाल क़दम बढ़ाया जा सकता है. सतत उन्होंने कहा कि सतत शान्ति निर्माण की ओर प्रयास करते समय, देशों को समुदायों के पुनर्निर्माण और शान्ति बरक़रार रखने के लिये अपनी आबादी के सभी वर्गों की हिस्सेदारी रखनी होगी. केनया के राष्ट्रपति उहुरू केनयाटा ने मंगलवार को आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता की. सुरक्षा परिषद में होने वाली अधिकाँश बैठकों का एजेण्डा घरेलू हिंसक संघर्ष पर आधारित है, जिनकी मुख्य वजहें अक्सर जातीय, नस्लीय, धार्मिक और सामाजिक-आर्थिक पहचान से जुड़े मुद्दे हैं. रवाण्डा के राष्ट्रपति पॉल कगामे, दक्षिण अफ़्रीकी के पूर्व राष्ट्रपित थाबो म्बेकी के अलावा, अफ़ग़ानिस्तान की संसद की पहली महिला उपसभापति फ़ौज़िया कूफ़ी ने भी इस चर्चा में हिस्सा लिया. मानवाधिकारों को बढ़ावा यूएन प्रमुख ने अपने सम्बोधन में कुछ अहम क्षेत्रों में कार्रवाई पर ज़ोर दिया है. उन्होंने कहा कि सबसे पहले यह सुनिश्चित किया जाना होगा कि राष्ट्रीय संस्थाएँ और क़ानून सभी लोगों के लिये काम करें, और उनके मानवाधिकारों की रक्षा व उन्हें बढ़ावा दें. “इसका अर्थ ऐसी नीतियों व क़ानूनों को लागू करना है जो निर्बल समूहों की रक्षा करते हों – इनमें नस्ल, जातीयता, लिंग, धर्म, विकलांगता, यौन रुझान और लैंगिक पहचान पर आधारित भेदभाव के विरुद्ध क़ानून हैं.” यूएन के शीर्षतम अधिकारी ने सचेत किया कि अस्थिरता से उभर रहे देश, अपनी आबादियों के सभी वर्गों के विचारों को नज़रअन्दाज़ करने का जोखिम मोल नहीं ले सकते. उन्होंने कहा कि इससे द्वेष पनप सकता है, जिसकी रोकथाम के लिये उप-राष्ट्रीय इलाक़ों से आने वाली आवाज़ों को शामिल किये जाने के रास्तों की तलाश की जानी होगी. “सरकारों को लोगों को एक साथ लाकर आगे बढ़ने के रास्तों की तलाश करनी होगी, एकजुट होकर, निरन्तर सम्वाद के ज़रिये, भिन्नताओं को पहचान कर और उनका आदर करते हुए. चाहे इसका अर्थ कुछ क्षेत्रों में प्रशासनिक अधिकारों को हस्तान्तरित करना ही हो.” यूएन प्रमुख के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र द्वारा ज़मीनी स्तर पर अभियान के ज़रिये राज्यसत्ता संस्थाओं व स्थानीय आबादियों के बीच सम्वाद को खुला व जारी रखने का प्रयास किया जाता है. इसकी मदद से देश के भविष्य को आकार देने में हर किसी का सहयोग लिया जा सकता है. महिलाओं व युवजन की अहम भूमिका यूएन महासचिव ने कहा कि शान्ति निर्माण प्रक्रिया और उसे बरक़रार रखने में महिलाओं व युवाओं को आवाज़ों को शामिल किया जाना बेहद अहम है. संयुक्त राष्ट्र शान्तिरक्षा अभियानों और विशेष राजनैतिक मिशनों में इस पहलू का विशेष रूप से ख़याल रखा जाता है. उदाहरणस्वरूप, सोमालिया में यूएन मिशन (UNSOM) ने देश में विभिन्न राजनैतिक दलों के भावी राजनीतिज्ञों को प्रशिक्षित किया है. साथ ही, स्थानीय प्रशासनिक विभागों और महिला नेताओं के साथ प्रयासों के ज़रिये राष्ट्रीय चुनावों में 30 फ़ीसदी लैंगिक आरक्षण को लागू किया गया है. यूएन प्रमुख ने ध्यान दिलाया कि एक वैश्विक समुदाय के तौर पर, शान्ति निर्माण के सफ़र में, महिलाओं व युवजन की भागीदारी को प्रोत्साहन व समर्थन देना जारी रखना होगा. अफ़ग़ान महिलाओं की समावेशन की माँग अफ़ग़ानिस्तान की पूर्व सांसद फ़ौज़िया कूफ़ी ने देश की सत्ता फिर से तालिबान द्वारा हथिया लिये जाने के बाद चिन्ता जताई है कि महिलाओं व लड़कियों को फिर से दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर बर्ताव हो रहा है. “वस्तुत:, वे हमें फिर से अदृश्य बना रहे हैं.” टिकाऊ विकास एजेण्डा के 17 लक्ष्यों में लैंगिक समानता भी एक अहम लक्ष्य है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि राजनैतिक प्रक्रियाओं, ढाँचों और कार्य पद्धतियों में महिलाओं की ज़रूरतों का ख़याल रखा जाना होगा. उन्होंने बताया कि अग़ानिस्तान में वे तालेबान के साथ आमने-सामने बैठ कर बातचीत करना चाहती हैं. “आप हमें अपनी मध्यस्थता टीमों में शामिल कर सकते हैं. आप हमारी महिलाओं के एक प्रतिनिधिमण्डल के साथ तालेबान की बैठक भी आयोजित कर सकते हैं.” “हम घर पर अपनी बहनों के लिये ऐसा करना चाहते हैं.” –संयुक्त राष्ट्र समाचार/UN News

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