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Sunday, March 22, 2026
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सुखबीर सिंह बादल को तख्त श्री पटना साहिब ने घोषित किया ‘तनखैया’, धार्मिक समन को किया था नजरअंदाज

शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल को सिख धर्म की एक बड़ी धार्मिक संस्था तख्त श्री पटना साहिब ने ‘तनखैया’ घोषित किया है।

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल को सिख धर्म की एक बड़ी धार्मिक संस्था तख्त श्री पटना साहिब ने ‘तनखैया’ (धार्मिक कदाचार का दोषी) घोषित किया है। यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि उन्होंने तख्त के समन (बुलावे) की लगातार अनदेखी की और तख्त के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप किया।

किसने लिया यह फैसला?

यह फैसला तख्त श्री पटना साहिब के पंज प्यारे (सिख धर्म के पांच धार्मिक प्रतिनिधि) ने लिया। इन पंज प्यारों का कहना है कि सुखबीर बादल ने तख्त की प्रबंधक समिति के अधिकारों में हस्तक्षेप किया और समिति के फैसलों को खुली चुनौती दी।

कई बार भेजा गया था समन, लेकिन…

तख्त पटना साहिब ने सुखबीर बादल को 21 मई 2025 और 1 जून 2025 को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया था। इसके बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के अध्यक्ष के कहने पर उन्हें 20 दिन का अतिरिक्त समय भी दिया गया, लेकिन फिर भी वह अकाल तख्त के सामने पेश नहीं हुए।

सुखबीर बादल पर आरोप क्या हैं?

तख्त की बैठकों के फैसलों को चुनौती देना, धार्मिक समिति के कार्यों में दखल तख्त द्वारा भेजे गए समनों की अनदेखी करना, सिख मर्यादा और सिद्धांतों का उल्लंघन करना जैसे आरोप उनपर लगे हैं। सुखबीर बादल से पहले, तख्त श्री अकाल तख्त साहिब के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गढ़गज और तख्त श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार टेक सिंह धनौला को भी तख्त पटना साहिब की ओर से तनखैया घोषित किया जा चुका है। यह मामला सिख समुदाय के धार्मिक नेतृत्व के बीच चल रहे तनाव को और गहरा करता दिख रहा है। तख्त पटना साहिब का यह फैसला श्री अकाल तख्त साहिब की पारंपरिक सर्वोच्चता को चुनौती देने जैसा भी देखा जा रहा है। अब सुखबीर बादल को धार्मिक रूप से दोषी मानते हुए सार्वजनिक माफी मांगने या पंज प्यारों के सामने पेश होकर अपना पक्ष रखने का विकल्प दिया गया है। अगर वह ऐसा नहीं करते, तो उन्हें सिख धर्म में कई धार्मिक कार्यों से वंचित किया जा सकता है। सिख धर्म के प्रमुख नेता सुखबीर बादल पर लगे ये धार्मिक आरोप न केवल उनके राजनीतिक करियर को प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि सिख धार्मिक संस्थाओं के बीच चल रहे विवाद को भी और गहरा कर सकते हैं।

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