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Friday, March 20, 2026
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विभिन्न स्रोतों से उजागर हुई असम में मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर : भाजपा

-राष्ट्रीय मीडिया का असम में मुस्लिम आबादी की गिरती दर का हवाला रहस्यमय और भ्रामक गुवाहाटी, 14 जून (हि.स.)। जनगणना के आंकड़ों के आधार पर असम की जनसंख्या असमान रूप से बदल गई है। जनसंख्या में असमान परिवर्तन के बारे में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) के पांच आंकड़ों के आधार पर कुछ राष्ट्रीय मीडिया में यह दावा किया गया है कि राज्य की मुस्लिम आबादी तेजी से घट रही है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हुआ है। विभिन्न आंकड़ों के आधार पर राज्य में मुस्लिम आबादी की वृद्धि के साफ संकेत दिखाई दे रहे हैं। ये बातें सोमवार को प्रदेश भाजपा मुख्यालय में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष जयंत मल्ल बरुवा और प्रदेश प्रवक्ता पबित्र मार्घेरिटा ने कही। उन्होंने जनगणना के आंकड़ों के अनुसार बताया कि 1991 से 2001 तक के समय में असम में हिंदू जनसंख्या वृद्धि दर 14.9 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 29.3 प्रतिशत थी। दूसरे शब्दों में इन दस वर्षों में हिंदू जनसंख्या से मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर दोगुनी हो गई थी। वर्ष 2001 से 2011 तक हिंदू जनसंख्या वृद्धि दर 10.9 प्रतिशत थी जबकि, मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 29.6 प्रतिशत थी। इन दस वर्षों में असम की मुस्लिम आबादी हिंदू आबादी की वृद्धि दर से तीन गुना बढ़ी। इस दशक में भी मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर पहले से भी कई गुना अधिक बढ़ गयी है। उल्लेखनीय है कि एनएफएचएस पांच बिंदुओं का हवाला देते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया ने वर्ष 2015 के 22 जनवरी के अंक में जनगणना आंकड़ों की जानकारी देते यह प्रकाशित किया था कि असम में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर पूरे देश में सबसे ज्यादा बढ़ी है। भाजपा नेताओं ने कहा है कि एक ही समाचार पत्र द्वारा एनएफएचएस की जानकारी का हवाला देते हुए विरोधाभासी बयान देना रहस्यमय और भ्रामक है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार सन् 1971 में असम की कुल आबादी 72.51 प्रतिशत हिंदू थी। इसके विपरीत मुस्लिम की कुल आबादी 24.56 प्रतिशत थी। लेकिन वर्ष 2011 में असम में हिंदू आबादी 61.46 प्रतिशत कम होने के विपरीत मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर 34.22 प्रतिशत हो गयी। वर्ष 1971 में असम में मुस्लिम बहुल दो जिलों के विपरीत वर्ष 2011 में मुस्लिम बहुल जिलों की संख्या दस तक बढ़ गयी है। एनएफएचएस के पांच बिंदुओं के मुताबिक वर्ष 2005-06 और वर्ष 2019-20 तक के समय में असम में बच्चों को जन्म देने वाली मुस्लिम महिलाओं की संख्या घटकर 3.6 से 2.4 तक कम हो गयी है। जबकि, बच्चों का जन्म देने वाली एक हिंदू महिला की संख्या 2 से घटकर 1.6 तक कम हो गयी है। यह रिपोर्ट प्रमाणित करता है कि महिलाओं की बच्चों को जन्म देने की दर पहले से कुछ कम होने से भी हिंदू महिलाओं की तुलना में मुस्लिम महिलाएं अभी भी अधिक बच्चों को जन्म दे रही हैं, जो कि राज्य की जनसंख्या वृद्धि का एक अहम कारण है और यह काफी चिंता का विषय है। अभी भी असम में एक एक हिंदू महिला के विपरीत एक मुस्लिम महिला दोगुनी दर से बच्चों को जन्म दे रही हैं। एक और चिंता की बात यह भी है कि असम में 18 साल से कम उम्र की किशोरी या युवती अभी भी काफी ज्यादा दर में बच्चों को जन्म दे रही है और एनएफएचएस की रिपोर्ट में इस जानकारी का सटीक तरीके से खुलासा किया गया है। इसका मतलब यह है कि इनमें से अधिकतर कम उम्र में बच्चों को जन्म देने वाली युवती और किशोरी मुस्लिम समुदाय से आती हैं। उल्लेखनीय है कि एनएफएचइस का डाटा पूरी तरह से नमूना सर्वेक्षण पर आधारित है। इसके विपरीत जनगणना, मतदाता सूची की जानकारी पूरी तरह क्षेत्रवार आधारित है। जनगणना और मतदाता सूची के आंकड़े बताते हैं कि असम में हिंदू आबादी वृद्धि दर में लगातार गिरावट आ रही है। इसके विपरीत मुस्लिम आबादी वृद्धि दर एक गंभीर तस्वीर पेश करती है, जो की समग्र रूप से राज्य के जनसंख्या की असमान परिवर्तन को प्रतिबिंबित करता है। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव और सन 2019 के लोकसभा चुनाव तथा वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या वृद्धि के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर राज्य की जनसंख्या में परिवर्तन की भयावह तस्वीर सामने आती है। चुनाव आयोग के आंकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि अल्पसंख्यक प्रभुत्व वाले मतदाताओं की संख्या अस्वाभाविक रूप से बढ़ा है और स्थानीय प्रभुत्व वाले इलाके में मतदाताओं की संख्या में बहुत ही कम बढ़ी है। यह आंकड़े असम के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय जनसमुदाय राजनीतिक रूप से अपना अधिकार धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं, यह बेहद भयावह स्थिति है। इस पर लगाम लगाने की आवश्यकता है। हिंदुस्थान समाचार/देबोजानी/अरविंद

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