नई दिल्ली, रफ्तार। पेरिस ओलंपिक 2024 का आगाज 26 जुलाई को होगा। इस बार भारत के 117 खिलाड़ी भाग ले रहे हैं। इनसे रिकॉर्ड मेडल की उम्मीदें बंधी हैं। वैसे, हम सबने देखा कि गोल्ड मेडल जीतने के बाद अक्सर एथलीट उसे दांतों से काटते हैं। यह कॉमन सवाल है कि किसी भी बड़े टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीतने वाला कोई एथलीट पोडियम पर खड़े होकर उसे दांतों से क्यों काटता है? जहन में जवाब आता होगा कि यह कोई नियम होगा या परंपरा होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। इतिहास के अनुसार पुराने समय में जब मुद्रा के रूप में कीमती धातु का इस्तेमाल होता था, तब सोने के सिक्कों की प्रामाणिकता की जांच के लिए व्यापारी उनको काटते थे।
मेडल को दांतों से काटकर अपनी कड़ी मेहनत और जोश को दर्शाते हैं : ओलंपिक
दरअसल, सोना नरम धातु है और थोड़े दबाव में फट-सा जाता है। यदि उसे कुतरा जाए तो वह अपनी छाप छोड़ता है। मगर, खिलाड़ियों के मामले में ऐसा कहना ठीक नहीं होगा। गौरतलब है कि 1912 से पहले शुद्ध सोने के मेडल दिए जाते थे। उसके बाद से इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी (IOC) ने प्योर गोल्ड मेडल देना बंद कर दिया था। हालांकि, कमेटी ने मेडल को दांतों से काटने के कारण ऐसा नहीं किया है। ऐसा भी चर्चा है कि 1912 से पहले एथलीट मेडल को दांतों से काटते थे, तब वे सोने की शुद्धता के लिए करते थे। मगर, यह परंपरा अब भी कायम है। वैसे, दूसरी धारणा है कि एथलीट ऐसा करके अपनी कड़ी मेहनत, टक्कर और जोश को दर्शाते हैं। ओलंपिक की वेबसाइट पर भी एक जानकारी अपलोड है। उसके मुताबिक एथलीट सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए मेडल को दांतों से काटते हैं। जब एथलीट मेडल लिए पोडियम पर खड़े होते हैं, तब फोटोग्राफर उनसे मेडल दांतों से काटने जैसा पोज बनाने को कहते हैं।
पोज खान होती है : फोटोग्राफर
फोटोग्राफर का मानना अलग है। वह हमेशा एथलीट से पोज की मांग करते हैं। यह पोज फोटोग्राफर के लिए शान होती है। उनका कहना है कि यह पोज अगले दिन अखबार के फ्रंट पेज पर छपती है। फोटोग्राफर एथलीट्स से पोज की अपील करते हैं। इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ ओलंपिक हिस्टोरियंस (ISOH) के पूर्व अध्यक्ष डेविड वालेचिन्स्की ने सीएनएन को कहा था कि मुझे लगता है कि वे इसे प्रतिष्ठित शॉट के रूप में देखते हैं, जिसे वे आसानी से बेच सकते हैं। मुझे नहीं लगता कि यह ऐसा कुछ है, जो एथलीट खुद से करें।
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