नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । भारत ने इंग्लैंड के खिलाफ पांच मैचों की टेस्ट सीरीज को 2-2 से बराबरी कर दी। जिसमें सीरीज का आखिरी मुकाबला ओवल टेस्ट में 6 रनों से रोमांचक जीत दर्ज सभी क्रिकेट फैंस का दिल जीत लिया। आखिरी मैच के इस नतीजे ने टीम इंडिया के जज्बे को सलाम किया और क्रिकेट जगत में खुशी का माहौल बना दिया।
शुभमन गिल के नेतृत्व वाली टीम इंडिया ने शानदार वापसी की, इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज में एजबेस्टन में धमाकेदार जीत से लेकर ओल्ड ट्रैफर्ड में मैच ड्रॉ और फिर ओवल में मोहम्मद सिराज और प्रसिद्ध कृष्णा के दम पर मिली रोमांचक जीत के बीच, इस दौरे में टीम इंडिया ने कई बार करिश्माई वापसी की। लेकिन जीत की खुशी में कुछ गंभीर सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
युवा कप्तान शुभमन गिल की अगुवाई में टीम ने शानदार प्रदर्शन कर भरपूर आत्मविश्वास से पूरी सीरीज में खेल दिखाया, लेकिन इस बीच कई गंभीर सवाल उठ रहे है जिसे इग्नोर नहीं किया जा सकता। गौतम गंभीर ने पिछले साल जुलाई में भारत के मुख्य कोच की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद से भारत ने व्हाइट-बॉल क्रिकेट में कई उपलब्धियां हासिल कीं। इस साल की शुरुआत में चैम्पियंस ट्रॉफी और टी20 फॉर्मेट में निरंतरता से जीत दर्ज करना इनमें शामिल हैं।
बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी भारत की पकड़ से फिसल गई
लेकिन, अगर हम टेस्ट श्रृंखला की बात करे तो गंभीर के टर्म में टीम ने सबसे ज्यादा खराब प्रर्दशन किया है। घरेलू जमीन पर न्यूजीलैंड के हाथों 0-3 की हार और फिर ऑस्ट्रेलिया में 1-3 की हार ने टेस्ट क्रिकेट में भारत की साख कड़ी चुनौती दी। 8 वर्षों में पहली बार बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी भारत की पकड़ से बाहर हो गई।
BCCI ने सख्त कदम उठाए
भारतीय टेस्ट टीम की इस कमजोरी को देखते हुए BCCI ने कुछ सख्त कदम उठाने का फैसला लिया। उस दौरान बोर्ड ने फैसला लिया कि सीनियर खिलाड़ियों के लिए घरेलू क्रिकेट खेलना अनिवार्य किया, निजी यात्राओं पर रोक, और दौरे के दौरान फैमिली की मौजूदगी सीमित कर दी।
बोर्ड के फैसले बाद रोहित शर्मा और विराट कोहली जैसे अनुभवी सीनियर प्लेयर्स पर भी यह दबाव साफ दिखा, लिहाजा एक साल पहले टी20 ओर अब टेस्ट क्रिकेट से भी अलग हो गए।
लेकिन, दौरान गंभीर और उनके सहयोगी स्टाफ अपनी इस आलोचना और कार्रवाई से बचे रहे। और एक सहायक कोच अभिषेक नायर को अप्रैल में फील्डिंग कोच टी दिलीप के साथ जरूर हटाया गया था, हालांकि, दिलीप को इंग्लैंड दौरे के लिए फिर से बहाल कर दिया गया।
ऐसे में यह कह जा सकता है कि इंग्लैंड में भारत की बहादुरी में गंभीर को श्रेय जरूर मिल सकता है, लेकिन टीम की कई बड़ी गलतियों की जिम्मेदारी भी उनसे जुड़ी है, क्योंकि वह फैसले उनके बिना संभव नहीं थे।
खिलाडिय़ों के चयन पर उठ रहे सवाल
– इस पूरे दौरे के दौरान भारत की सिलेक्शन नीति पर सवाल उठते रहे। सबसे बड़ी बहस का विषय बना। कुलदीप यादव को एक भी टेस्ट में मौका न देना, जबकि कई पूर्व दिग्गज लगातार उनके पक्ष में आवाज उठा रहे थे।
– दूसरी ओर, बाएं हाथ के बैटर और स्पिन ऑलराउंडर रवींद्र जडेजा और वॉशिंगटन सुंदर को लगातार मैच में रखा गया।
– खासकर जब सुंदर को एजबेस्टन टेस्ट में जोड़ा, लेकिन ओवल टेस्ट में दोनों ने मिलकर सिर्फ 10 ओवर डाले, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या उन्हें केवल बल्लेबाज के तौर पर टीम में रखा गया था?
– इसी तरह, मैनचेस्टर टेस्ट में अंशुल कम्बोज को डेब्यू कराना भी एक चर्चा का विषय बन गया, खासतौर पर तब, जब भारत 1-2 से पीछे था और मैच में मजबूत गेंदबाजी की दरकार थी।
क्यूरेटर से जुबानी जंग, सहायक कोच को हटाने की उम्मीद?
गंभीर के लिए ओवल में अंतिम टेस्ट से पहले क्यूरेटर के साथ विवाद में पड़ना भी उनकी कोचिंग शैली को लेकर बनी नकारात्मक धारणा को और गहरा कर गया। वही, अप्रैल में अभिषेक नायर की विदाई के बाद अब संभावना है कि BCCI सहायक कोच टेन डोशेट और गेंदबाजी कोच मोर्कल को भी बाहर का रास्ता दिखा सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, घरेलू टेस्ट सीजन से पहले टीम के सहयोगी स्टाफ में नए चेहरे जोड़े जाने की तैयारी हो रही है।
गंभीर काल – 13 टेस्ट मैचों में 3 जीत
ओवल की जीत ने भले ही गंभीर का राहत दी हो, लेकिन आंकड़े अभी भी खराब हैं। टेस्ट कोच के तौर पर पिछले 13 मैचों में यह उनकी सिर्फ तीसरी जीत थी। भारत जीत हासिल करने में कामयाब रहा, क्योंकि रणनीति के तौर पर नहीं, बल्कि खिलाड़ियों ने उस समय अच्छा प्रदर्शन किया जब उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी थी।
क्या ड्रॉ ही रही टीम इंडिया की नई मंजिल?
ओवल मिली जीत ने शायद गौतम गंभीर की कोचिंग की सीट बच गई हो, लेकिन बतौर रेड-बॉल कोच उनकी सोच और रणनीति पर गंभीर सवाल बने हुए हैं। कब तक वह टी20 शैली की टीमों का चयन करते रहेंगे, जहां टेस्ट क्रिकेट में 20 विकेट लेने की क्षमता की जगह एक अनिश्चित बल्लेबाजी प्राथमिकता दी जाती है?
ऐसे में टीम और कोच पर गंभीर सवाल खड़े होते है क्या अब टीम की उम्मीद सिर्फ फॉलोऑन बचाने और टेस्ट सीरीज ड्रॉ करने तक सीमित रह गई हैं? या फिर इस टीम को उन जीतों के लिए लड़ना चाहिए, जिनका वह अपनी प्रतिभा के दम पर असल में हकदार है?





