नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। भारत के सिक्सर किंग युवराज सिंह आज अपना 44वां जन्मदिन मना रहे हैं। वे भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े मैच विनर्स में गिने जाते हैं। 6 छक्कों वाली पारी से लेकर वर्ल्ड कप 2011 में मैन ऑफ द टूर्नामेंट बनने तक युवी की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं। लेकिन एक सवाल हमेशा लोगों को उत्सुक करता है युवराज सिंह, टीम इंडिया का युवराज बना कैसे? इसकी असली कहानी दो लोगों से शुरू होती है उनके पिता योगराज सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू की एक ना जिसने युवा युवराज की पूरी जिंदगी बदल दी।
सिद्धू ने कहा था-“ये क्रिकेट नहीं खेल सकता”
एक बार योगराज सिंह अपने बेटे युवराज को लेकर नवजोत सिंह सिद्धू के पास गए। युवराज ने खुद बताया था कि सिद्धू ने उनकी बैटिंग देखकर पापा से हाथ जोड़कर कहा, इससे क्रिकेट नहीं होगा। इस एक लाइन ने पिता योगराज सिंह की जिद को आग दे दी। सिद्धू की ना ने ही युवराज की जिंदगी में सबसे बड़ी हाँ लिख दी।
अगले दिन ही पिता ने छुड़वा दिए स्केट्स
युवराज उस समय नेशनल रोलर स्केटिंग चैंपियन थे। वे 14 साल से भी कम उम्र में मेडल जीत चुके थे। लेकिन सिद्धू की बात सुनते ही योगराज सिंह ने अगले ही दिन कहा, “स्केटिंग खत्म! अब सिर्फ क्रिकेट… और कुछ नहीं। युवराज बताते हैं कि पिता उनकी इतनी सख्त ट्रेनिंग करवाते थे कि कभी-कभी लेदर बॉल और टेनिस बॉल से लगातार बाउंसर मारते थे वो भी बिना हेलमेट के सिद्धू ने इस किस्से का जिक्र करते हुए कहा था मैंने योगराज से पूछा तुसी मुंडा मारना है क्या? लेकिन योगराज की जिद और युवी की मेहनत ने भारतीय क्रिकेट को एक चमकता सितारा दिया।
स्केटिंग चैंपियन से क्रिकेट के सुपरस्टार बनने तक का सफर
युवराज सिंह को शुरू में क्रिकेट से कोई खास लगाव नहीं था। उन्हें टेनिस या स्केटिंग ज्यादा पसंद थी। युवराज ने राष्ट्रीय स्तर पर मेडल भी जीता था, लेकिन उनके पिता ने वह मेडल भी फेंक दिया। वजह सिर्फ एक बेटा क्रिकेटर बने। बहुत कम उम्र से शुरू हुई वही सख्त ट्रेनिंग बाद में बनी युवराज की ताकत। यही वजह है कि वे आगे चलकर भारत के सबसे बड़े मैच फिनिशर बने।





