नई दिल्ली, रफ्तार न्यूज। वैवाहिक संबंधों में Rape अपराध है या नहीं, अब यह सुप्रीम कोर्ट तय करेगा। Marital Rape को लेकर केंद्र सरकार ने कोई राय जाहिर नहीं की है। इसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट इस मामले को लेकर विचार करने का फैसला किया है। अदालत का कहना है कि वह इस बात पर विचार करेगी कि मैरिटल रेप के आरोपों में पति को छूट मिलनी चाहिये या नहीं।
Supreme Court के मुख्य न्यायधीश D.Y Chandrachud ने बुधवार 18 सितंबर को कहा कि उन्होंने यह टिप्पणी सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह के अनुरोध के बाद की है। जिसमें उन्होंने Chandrachud की अध्यक्षता वाली बेंच से निश्चित तारीख तय करने का अनुरोध किया था। यह मामला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की बेंचों के सामने लिस्टेड है और न्यायालय में अपने निर्णय का इंतजार कर रहा है। चलिए आपको पूरे मामले के बारे में बताते हैं कि किसने यह याचिका दायर की और सुप्रीम कोर्ट की इस मामले पर क्या राय है?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने All India Democratic Women Association (AIDWA) की याचिका पर नोटिस जारी किया और कहा है कि इस मामले को अपराध की मांग करने वाली अन्य याचिकाओं के साथ जुलाई में सुनवाई के लिए लिस्टेड किया जाएगा।
जजों की बेंच ने कहा है कि यह एक संवैधानिक मामला है और नए कानून के बाद भी जीवित रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 16 जनवरी 2023 को Indian penal code (IPC) के उस प्रावधान के खिलाफ कुछ याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था जो पत्नी के एडल्ट होने पर जबरन यौन संबंध बनाने के दोष में पति को सुरक्षा प्रदान करता है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रावधान को असंवैधानिक घोषित किया था
एक वकील ने बताया कि कार्यवाही के दौरान सरकार के पास हलफनामा दखिल करने के कई मौके थे मगर सरकार ने हलफनामा दाखिल नहीं की है। इसपर चंद्रचूड़ ने कहा, ‘फिर वे (केंद्र) कानून पर बहस करेंगे। हम उनके अनुसार फैसला करेंगे।’
पिछले साल ही कोर्ट ने इस मामले पर IPC की धारा 375 के अपवाद-2 (Exception-2) की वैधता से संबंधित दिल्ली हाई कोर्ट के विभाजित फैसले के खिलाफ अपील के संबंध में केंद्र से जवाब मांगा था।
कार्यकर्ता रूथ मनोरमा के साथ याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह अपवाद महिला की सहमति को कमजौर करता है तथा उसकी शारीरिक आत्मनिर्णय, अखंडता और गरिमा का उल्लंधन करता है।
दिल्ली हाई कोर्ट के जज राजीव शकघर ने फैसला सुनाते हुए इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित किया था और जज सी. हरिशंकर ने इसे बरकरार रखा था।
23 मार्च को कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले पर जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी जिसमें अपनी पत्नी का यौन उत्पीड़न करने और गुलाम बनाने के आरोप के खिलाफ IPC की धारा 376 के तहत बलात्कार के आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
क्या है पूरा मामला?
बता दें कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में दिए गए अपवाद के अनुसार अगर पत्नी नाबालिक नहीं है तो पति के द्वारा उसके साथ संभोग या जबरन यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं माना जाएगा।
बता दें कि, भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अनुसार धारा 63 जो बलात्कार के अपवाद-2 में बताया गया है कि यदि पत्नी की उम्र 18 साल से कम नहीं है तो पति के द्वारा उसके साथ संभोग या यौन क्रिया करना बलात्कार नहीं है।
AIDWA ने BNS की धारा 67 की संवैधानिकता को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। धारा 67 के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति पत्नी के साथ संभोग करता है और पत्नी अलग रह रही हो तो उसे दो से सात साल तक की जेल हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यह मामला तब लागू होता है, जब पत्नी अलगाव के आदेश के तहत या किसी और वजह से अलग रह रही हो।
इस कानून पर वकील रुचिका गोयल द्वारा याचिका की गई है। याचिका में प्रावधान पर आपत्ति जताई गई है कि धारा 67 न्यूनतम 10 साल की सजा से कम है।





