नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। तारीख थी 17 अप्रैल और साल था 1999। इस दिन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। जिसके लिए वोटिंग होनी थी, लेकिन इसमें एक पेंच था। दरअसल कांग्रेस के एक सांसद गिरधर गोमांग ओडिशा के मुख्यमंत्री बन गए थे और सदन में वो वोट डाल सकते हैं कि नहीं इसका फैसला लोकसभा स्पीकर को करना था। उस समय बीजेपी और टीडीपी का गठबंधन था और TDP नेता बालयोगी लोकसभा अध्यक्ष थे। अगर गोमांग वोट करते तो NDA की सरकार गिरनी तय थी। तब लोकसभा अध्यक्ष बालयोगी ने गोमांग को वोट डालने का अधिकार दे दिया और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर गई। ये बताने के लिए काफी है कि सदन में लोकसभा अध्यक्ष की ताकत क्या है।
लोकसभा स्पीकर पद के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष में है तकरार
दरअसल पिछले कुछ दिनों से सत्ता पक्ष और विपक्ष में लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के लिए खींचतान चल रही है। बीजेपी का कहना है कि सत्ता पक्ष की तरफ ही दोनों पद रहेंगे। तो वहीं INDIA गठबंधन का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष का पद जहां सत्ता पक्ष के पास रहता है। तो वहीं लोकसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्ष के पास रहता है। विपक्ष को लोकसभा उपाध्यक्ष का पद ना देकर बीजेपी संसदीय मूल्यों को खत्म कर रही है। जिसको लेकर अब इतिहास में पहली बार लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होने जा रहा है। जानकारी के मुताबिक 26 जून को लोकसभा स्पीकर का चुनाव किया जाएगा।
कितना अहम है स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का पद
लोकसभा के स्पीकर का पद सत्ता पक्ष की ताकत का प्रतीक माना जाता है। उसके पास लोकसभा के कामकाज का पूरा कंट्रोल होता है। वहीं डिप्टी स्पीकर का काम है कि लोकसभा स्पीकर की अनुपस्थिति में उनका काम उसी तरह से करना होता है। दरअसल सदन कैसे चलेगा और सदन में किसको कितना समय देना है ये लोकसभा स्पीकर ही तय करता है। संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत स्पीकर संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करता है। यहीं नहीं लोकसभा में विपक्ष का नेता कौन होगा ये स्पीकर ही तय करता है।
स्पीकर की ये है जिम्मेदारी
स्पीकर का मुख्य काम सदन को नियम और कानूनी तरीके से चलाना है। संसद सदस्यों की शक्तियों और विशेषाधिकारों की रक्षा करना भी स्पीकर की ही जिम्मेदारी होती है। संसद से जुड़े किसी भी मामले में स्पीकर का फैसला सर्वोच्च होता है। इसके अलावा स्पीकर के फैसले को बदलने का सुप्रीम कोर्ट के पास भी सीमित अधिकार होता है।
1985 में राजीव गांधी सरकार ने स्पीकर को दी थी ज्यादा शक्तियां
संसद में किसी बिल या अहम मुद्दों पर कौन वोट कर सकता है और कौन नहीं जैसा कि अटल बिहारी के मामले में हमने देखा) का फैसला भी लोकसभा स्पीकर ही करता है। इसके अलावा सदन कब तक चलेगा और कब स्थगित करना है। इसका निर्णय भी इसी की जिम्मेदारी होती है। 1985 में दल बदल कानून को रोकने के लिए राजीव गांधी सरकार ने स्पीकर को काफी ज्यादा शक्तियां प्रदान की थी।
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