नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। एनडीए की सहयोगी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) ने उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी दावेदारी ठोक दी है। पार्टी अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने सोमवार को प्रदेश कार्यकर्ताओं के साथ अहम बैठक कर संगठन की ताकत का जायजा लिया और साफ संकेत दिए कि आने वाले चुनावों में आरपीआई पूरी मजबूती से मैदान में उतरेगी। आठवले के इस आक्रामक रुख से सपा और बसपा की रणनीतियों पर असर पड़ने की अटकलें तेज हो गई हैं, वहीं यूपी की राजनीति में नए समीकरण बनने के संकेत भी मिलने लगे हैं।
डीपीए फार्मूले के साथ मैदान में आठवले
रामदास आठवले ने दावा किया कि उनकी पार्टी यूपी में डीपीए यानी दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग को साथ लेकर बदलाव की राजनीति करेगी। उन्होंने कहा कि सपा का पीडीए नारा केवल चुनावी जुमला बनकर रह गया है, जबकि आरपीआई डीपीए की अवधारणा को जमीन पर उतारने के लिए काम कर रही है। आठवले के मुताबिक, उनकी पार्टी अब सामाजिक न्याय के मुद्दों को नए सिरे से उठाएगी।
संगठन विस्तार का दावा
आठवले ने बताया कि उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से 62 जिलों में पार्टी की कार्यकारिणी गठित हो चुकी है। उन्होंने अगले साल 5 अप्रैल 2026 को लखनऊ में एक विशाल रैली करने की घोषणा की, जिसमें एक लाख से अधिक लोगों के शामिल होने का दावा किया गया है। उनका कहना है कि बसपा की राजनीतिक जमीन अब धीरे-धीरे रिपब्लिकन पार्टी ले रही है और दलितों व गरीबों की असली आवाज आरपीआई बनेगी।
मायावती और अखिलेश पर हमला
बसपा प्रमुख मायावती पर निशाना साधते हुए आठवले ने कहा कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद दलितों, वंचितों और महिलाओं के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ। वहीं अखिलेश यादव के पीडीए मॉडल पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यह सिर्फ चुनावी रणनीति साबित हुई है, जिसका जमीन पर कोई असर नहीं दिखा।
यूपी डीपीए की लड़ाई
रामदास आठवले ने दोहराया कि आरपीआई नारेबाजी नहीं, बल्कि जमीनी राजनीति में विश्वास रखती है। पार्टी डीपीए के मुद्दे को लेकर गांव-गांव तक पहुंचेगी और दलित, पिछड़े व अल्पसंख्यक समुदायों के हक की लड़ाई लड़ेगी। उनके इस आक्रामक तेवर से यूपी की राजनीति में नए समीकरण बनने के संकेत मिलने लगे हैं।





