नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। PM Modi इस समय पोलैंड के दौरे पर हैं। यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री का 45 साल बाद पोलैंड दौरा है। यहां वो पोलैंड के राष्ट्रपति आंद्रेज सेबेस्टियन डूडा और प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क से मुलाकात करेंगे। जहां पीएम मोदी का भव्य स्वागत किया जाएगा। लेकिन आज बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नहीं होगी। आज उस व्यक्ति की बात होगी जिसे आज भी पोलैंड में लोग भगवान की तरह मानते हैं। चाहे बूढ़े हों या जवान हो सभी लोग उनकी दरियादिली के आज भी कायल हैं। हम बात कर रहे हैं गुजरात के जामनगर स्टेट के महाराजा दिग्विजय सिंह रणजीत सिंह जाडेजा की। आखिर उनको पोलैंड के लोग क्यों भगवान मानते हैं और उनके स्मारक इत्यादी बनवाते हैं। आइये जानते हैं…
1939 में जर्मनी और रूस ने पोलैंड पर किया था हमला
ये बात है 1 सितंबर 1939 की। इस दिन जर्मनी के सनकी तानाशाह हिटलर ने सोवियत रूस के तानाशाह स्टालिन के साथ एक संधी करके पोलैंड पर आक्रमण कर देता है। इसके ठीक 16 दिनों के बाद रूस की सेना भी पोलैंड पर चढ़ाई कर देती है। पोलैंड जैसा एक छोटा सा देश इन महाशक्तियों का सामना नहीं कर पाता और पूरा देश जर्मनी और रूस के कब्जे में चला जाता है। इस हमले में पोलैंड के हजारों सैनिक मारे जाते हैं और कई बच्चे अनाथ हो जाते हैं। इन अनाथ बच्चों को कैंपों में रखा जाता है, जहां ना तो अच्छे खाने मिलते थे और ना ही पीने को साफ पानी। इन कैंपों की स्थिति काफी खराब रहती है। ये स्थिति 1941 तक रूस और जर्मनी में लड़ाई होने तक ऐसी ही बनी रहती है।
महाराजा दिग्विजय सिंह ने वार कैबिनेट की बैठक में दिया था प्रस्ताव
इसके बाद रूस उन कैंपों में रह रहे बच्चों को वहां से जाने का आदेश देता है। जिसके बाद बच्चे वहां से दूर-दराज के विभिन्न देशों के लिए निकल गए। इसके बाद जब ब्रिटेन में वार कैबिनेट की बैठक हुई तो इन बच्चों को लेकर चर्चा हुई। इस वार कैबिनेट में नवानगर के राजा दिग्विजय सिंह जी जडेजा भी थे। तब आज के जामनगर को नवानगर के नाम से जाना जाता था। इस बैठक में दिग्विजय सिंह ने इन बच्चों को अपने पास आश्रय देने का ब्रिटिश सरकार को प्रस्ताव दिया। जिसे ब्रिटिश सरकार ने मान लिया।
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तुर्कमेनिस्तान के रास्ते पोलिस बच्चों को भेजा गया भारत
इसके बाद इन बच्चों को तुर्कमेनिस्तान के अशगबात भेज दिया गया। वहां से इन बच्चों को मुम्बई पहुंचाया गया। इन बच्चों के मुंबई पहुंचने पर महाराजा दिग्विजय सिंह ने जामनगर से 25 किलोमीटर दूर स्थित बालाचड़ी गांव में इन्हें रहने का आसरा दिया। वहां पहली बार में कुल 170 बच्चे जो अनाथ हो गए थे पहुंचे। कुछ समय बाद यहां कुल 600 पोलिश बच्चे पहुंचे। अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर इन अनाथ बच्चों के लिए दिग्विजय सिंह ही पिता के समान थे। जो इनकी हर सुविधाओं का ख्याल रखते थे।
बालाचड़ी गांव में पोलिश बच्चों के लिए बनवाए थे घर और स्कूल
बालाचड़ी गांव में उन्होंने इन बच्चों के रहने के लिए एक घर, स्कूल, खेलने का मैदान, टेनिस कोर्ट इत्यादी सब कुछ का इंतेजाम किया। सभी बच्चों को खुद का बिस्तर दिया गया था। इसके साथ ही इनके खाने, कपड़े और चिकित्सा सुविधाओं का भी पूरा ख्याल रखा गया। महाराजा ने इन बच्चों के लिए एक लाइब्रेरी भी बनवाई थी। जिनमें पोलिश भाषा की किताबें थी। इसके अलावा बच्चों के लिए फुटबॉल का मैदान भी बनवाया और उनको सिखाने के लिए कोच का प्रबंध किया। यहां पर सारे पोलिश त्योहार मनाए जाते थे।
1946 में भारत से ये बच्चे वापस पोलैंड भेजे गए
1945 में जब दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हो गया तो पोलैंड सोवियत यूनियन के हिस्से में चला गया। 1946 में पोलिश सरकार ने इन बच्चों को पोलैंड भेजने के लिए कहा। जिसके बाद इन बच्चों को वापस पोलैंड भेज दिया। जब बच्चे वापस जाने लगे तो महाराजा ने पोलिश जनरल व्लादस्ला सिकोर्स्की को बुलाया और कहा कि पोलैंड में उनके नाम पर एक रास्ते का नाम रख दिया जाए। हालांकि कम्युनिस्ट पोलैंड ने उनके इस मांग को ठुकरा दिया।
सोवियत संघ के विघटन के बाद पोलैंड ने दिया महाराजा को सम्मान
फिर साल आता है 1989। इस साल सोवियत संघ का विघटन हो जाता है और पोलैंड अलग देश बन जाता है। सोवियत संघ से अलग होने के बाद पोलैंड ने महाराजा के प्रति कृतज्ञता अपनी राजधानी वॉरसॉ में उनके नाम पर एक चौक का नाम रखकर प्रकट किया। हालांकि ये दिन देखने के लिए तब जामनगर के महाराजा जिंदा नहीं थे। उनका साल 1966 में निधन हो गया था। इसके बाद साल 2012 में वॉरसॉ के एक पार्क का नाम भी महाराजा दिग्विजय सिंह के नाम पर रखा गया। इसके साथ ही पोलैंड ने महाराजा दिग्विजय सिंह को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान कमांडर्स क्रॉस ऑफ दि ऑर्डर ऑफ मेरिट भी दिया।
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पोलिस बच्चों के लिए बनाई गई लाइब्रेरी का क्या हुआ ?
दरअसल महाराजा के द्वारा बालाचड़ी गांव में बनाई गई लाइब्रेरी को सैनिक स्कूल के रूप में बदल दिया गया। जहां बच्चों को सैन्य पढ़ाई कराई जाती है। साल 2018 में पोलैंड की आजादी के 100 साल पूरे हुए थे। इस उपलक्ष्य पर इन पोलिश बच्चों में से जीवित बचे कुछ लोग बालाचड़ी गांव आए थे। जहां उन्होंने अपने बचपन के सबसे मुश्किल दिनों को याद किया और महाराजा के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया था।





