नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । देश में नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले की खूब चर्चा हो रही है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) इस केस में जांच कर रहा है। इस मामले में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस ओवरसीज प्रमुख सैम पित्रोदा के नाम शामिल है। इनके खिलाफ ED ने मामले की जांच और छानबीन कर दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी है। मामला एक राजनीति पार्टी और नेताओं से जुड़ा होने की वजह से ईडी और चार्जशीट इन दिनों सुर्खियों में है। कानूनी प्रक्रिया और मीडिया में तो आपने चार्जशीट के बारे में सुना ही होगा। लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर चार्जशीट (Chargesheet) क्या होती है और अदालत में इसकी क्या अहमियत है। चलिए इस बारे में जानते हैं।
क्या होती है चार्जशीट? (what is a charge sheet)
चार्जशीट एक लिखित दस्तावेज है जो क्रिमिनल कोर्ट में अपराध के आरोपों को साबित करने के लिए तैयार की गई एक लिखित जानकारी है। इसे पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसियों के द्वारा तैयार किया जाता है। किसी मामले में केस दर्ज होने के बाद पुलिस जांच करती है। इसके बाद पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसियों के द्वारा आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए कोर्ट में सामने एक चार्जशीट को पेश किया जाता है। यह किसी मामले या केस की लिखित रिपोर्ट होती है।
अदालत तय करती है आरोप
चार्जशीट में FIR दर्ज होने के प्रोसेस से लेकर जांच पूरी होने तक की सारी डिटेल्स जानकारी और रिपोर्ट में शामिल होती है। जब चार्जशीट पूरी तरह से लिखित और मौखित तौर पर तैयार हो जाती है तो फिर पुलिस द्वारा इसे मजिस्ट्रेट का सौंप दिया जाता है। इसके बाद कोर्ट चार्जशीट में मौजूद अपराध का संज्ञान लेती है, मजिस्ट्रेट के संज्ञान लेने के बाद वह शख्स को अभियुक्त माना जाता है। इसके बाद यह कोर्ट तय करता है कि अभियुक्तों में से किसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत है या नहीं। जब कोर्ट द्वारा आरोप सही साबित हो जाते है, तो इसके बाद आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाया जाता है।
कितने दिनों बाद सुनाई जाती है सजा
पुलिस या जांच एजेसियां संबंधित मामले में 90 दिनों के भीतर चार्जशीट को तैयार कर अदालत में पेश करती है। यह कोर्ट में आरोपी के खिलाफ आरोप तय करने में मदद करती है। यह रिपोर्ट आगामी कानूनी प्रक्रिया के लिए तैयार की जाती है। कोर्ट इस चार्जशीट को देखकर यह तय करती है कि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं या नहीं। अगर सबूत पर्याप्त है तो आरोप के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, और आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले तो वह आरोपों को निरस्त कर सकती है।





