नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । महात्मा गांधी जिन्हें लोग राष्ट्रपिता के नाम से भी जानते हैं, उनकी आज पुण्यतिथि है। मोहनदास करमचंद गांधी एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग से भारत को स्वतंत्रता दिलाई। कुछ लोग उन्हें महात्मा कहते हैं, तो कुछ लोग उन्हें ‘बापू’ कहते हैं। महात्मा गांधी की मृत्यु स्वतंत्रता के कुछ महीने बाद 30 जनवरी 1948 को हुई। गांधीजी की नाथूराम गोडसे ने प्रार्थना के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह दिन इतिहास में गांधीजी की पुण्यतिथि के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। आज उस घटना की 77वीं वर्षगांठ है। क्या आप जानते हैं कि उस दिन वास्तव में क्या हुआ था, आइये जानते हैं।
दरअसल, 1947 में हम स्वतंत्र तो हुए, लेकिन उसी समय भारतीय मुख्य भूमि से अलग होकर एक नया राष्ट्र ‘पाकिस्तान’ बना। इस दौरान हुए विभाजन और इसके परिणामस्वरूप हुए नरसंहार, दंगों और हिंदुओं और मुसलमानों के बलात्कारों के लिए महात्मा गांधी को जिम्मेदार माना गया। यह गुस्सा शरणार्थियों और भारत के कुछ युवाओं के मन में था। गांधी जी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का समर्थन किया था और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी उन्होंने पाकिस्तान से शांति और सद्भावना का रुख अपनाया था। वे पाकिस्तान को धन देने के पक्ष में थे, जिसे नाथू राम गोडसे और उनके साथी सही नहीं मानते थे। उनका मानना था कि पाकिस्तान को भारत से कोई सहायता नहीं मिलनी चाहिए।
हिंदू महासभा और गोडसे का विरोध
नाथू राम गोडसे और उनके साथी हिंदू महासभा से जुड़े हुए थे। वे गांधी जी की नीतियों को हिंदू विरोधी मानते थे और उनका मानना था कि गांधी जी भारतीय मुसलमानों के प्रति अत्यधिक सहानुभूति दिखाते हैं। उनके अनुसार, गांधी जी ने हिंदू समाज के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए थे, जबकि वे मुसलमानों के लिए कई रियायतें देने को तैयार थे। गांधी जी ने हमेशा अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलने की बात की थी। उनका मानना था कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। यह दृष्टिकोण उन लोगों को पचता नहीं था जो अपनी समस्याओं का समाधान हिंसक तरीकों से निकालने के पक्ष में थे। खासकर, गोडसे और उनके जैसे लोग गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत से असहमत थे।
भारत विभाजन और उसके बाद की स्थिति
जब भारत विभाजन के बाद एक हिंसक माहौल था, तो गांधी जी ने मुस्लिम और हिंदू समुदायों के बीच शांति की कोशिश की। 1947 में विभाजन के दौरान लाखों लोग मारे गए थे और यह स्थिति बहुत जटिल थी। गांधी जी ने पाकिस्तान और भारत के बीच शांति बनाए रखने की कई बार कोशिश की, लेकिन यह कुछ लोगों के लिए असहनीय था। उन्हें लगता था कि गांधी जी इस समय के माहौल के मुताबिक बहुत कमजोर और अधिक समझौते करने वाले थे। इन कारणों के कारण नाथू राम गोडसे और उसके साथियों ने गांधी जी की हत्या की योजना बनाई। उनका मानना था कि गांधी जी की नीतियाँ भारतीय संस्कृति और हिंदू समाज के खिलाफ थीं, और गांधी जी की हत्या को वे इस स्थिति का समाधान मानते थे।
जाने हत्या वाले उस दिन क्या हुआ था ?
30 जनवरी, 1948 के दिन महात्मा गांधी दिल्ली के बिड़ला भवन में शाम 5.10 बजे अपने कमरे से बाहर निकले। गांधी जी हर दिन यहां प्रार्थना सभा आयोजित करते थे। उस दिन भी उन्होंने अपनी प्रार्थना सभा रखी थी। उस दिन बहुत सारे लोग उस महान व्यक्ति को देखने, उनसे मिलने, शिकायत करने और चर्चा करने आये थे। जल्द ही पिस्तौल से गोलियां चलने की आवाज सुनाई दी और एक पल के लिए सभी लोग स्तब्ध रह गए। जब गगनभेदी सन्नाटा समाप्त हुआ, तब लोगों को होश आया। महात्मा गांधी गिर चुके थे और नाथूराम की पिस्तौल से अभी भी धुआँ निकल रहा था। नाथूराम को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और सार्वजनिक अशांति से दूर रखने के लिए एक तरफ ले जाया गया। पुलिस को दिए गए अपने बयान में नाथूराम ने कहा, “मैंने अपनी पिस्तौल को लोगों के बीच घूमते देखा, इसलिए इसे ले लो। इसका सेफ्टी कैच खुला है। लोग एक-दूसरे पर गोली चला सकते हैं।”
गोली लगने से गांधी जी को गंभीर चोटें आईं और उन्होंने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया। गांधी जी की हत्या के बाद उनके शव को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। गांधी जी की हत्या के बाद पूरे देश में शोक की लहर फैल गई। इस दुखद घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। कई जगह शांति सभा और उपवास आयोजित किए गए। नाथू राम गोडसे को हत्या के बाद तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। गोडसे और उसके साथियों ने गांधी जी की हत्या का कारण उनके द्वारा पाकिस्तान के पक्ष में की गई नीतियों को बताया, लेकिन इसके बाद उन्हें कोर्ट में दोषी ठहराया गया और गोडसे को फांसी दी गई।




