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Thursday, March 12, 2026
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लोकपाल के लिए 7 BMW कारों की खरीद पर बवाल, किरण बेदी और अशोक खेमका ने जताई नाराज़गी

लोकपाल द्वारा 7 BMW कारें खरीदने के फैसले ने विवाद खड़ा कर दिया है। किरण बेदी, अशोक खेमका और विपक्ष ने इसे स्वदेशी मिशन के खिलाफ और सादगी के सिद्धांतों के विपरीत बताया है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ बनी सबसे बड़ी संस्था लोकपाल अब खुद विवादों में है। कारण है कि संस्था ने 7 BMW कारें खरीदने का टेंडर जारी किया है। करीब 5 करोड़ रुपये की इस खरीद पर अब सवालों का सैलाब उमड़ पड़ा है। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “स्वदेशी” और मेक इन इंडिया का संदेश दे रहे हैं, तो वहीं लोकपाल की इस विदेशी पसंद पर पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने तीखा हमला बोला है।

जब पीएम स्वदेशी की बात करते हैं तो लोकपाल BMW क्यों?

किरण बेदी ने कहा, लोकपाल को तो स्वदेशी इलेक्ट्रिक कारें खरीदनी चाहिए थीं। जब प्रधानमंत्री खुद स्वदेशी का प्रचार करते हैं, तो संस्था जो भ्रष्टाचार के खिलाफ बनी है, उसे विदेशी गाड़ियों की क्या ज़रूरत है? भारत में क्या अच्छी कारें नहीं बनतीं?उन्होंने यह भी जोड़ा कि लोकपाल का कुल बजट 44.32 करोड़ है, और सिर्फ कारों पर 10 फीसदी पैसा खर्च करना ग़ैर-ज़रूरी और असंवेदनशील फैसला है। किरण बेदी ने याद दिलाया, अन्ना हजारे आंदोलन के बाद बड़ी उम्मीदों के साथ लोकपाल बना था, लेकिन यह संस्था अपने असली मकसद से भटकती दिख रही है।

आंकड़ों में विरोधाभास

बता दें कि, साल 2023–24 के बजट में लोकपाल ने मोटर वाहन मद के तहत सिर्फ ₹12 लाख रखे थे और पूरा खर्च शून्य दिखाया गया था। लेकिन अब अचानक 70 लाख रुपये की BMW गाड़ियां खरीदने की तैयारी है। अब इसी को लेकर ईमानदारी की मिसाल माने जाने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने भी लोकपाल के फैसले पर सवाल उठाए है उन्होनें कहा, लोकपाल जैसी संस्था को सादगी का प्रतीक होना चाहिए, न कि शानो-शौकत का काम बताओ, क्या किया अब तक? 

प्रदर्शन पर भी उठे सवाल

लोकपाल को अब तक 8,703 शिकायतें मिली हैं, जिनमें से सिर्फ 24 मामलों में जांच शुरू हुई और 6 में ही मुकदमा चलाने की मंजूरी दी गई। ऐसे में आलोचकों का कहना है कि जब संस्था का कामकाज इतना सीमित है, तो करोड़ों की कारों की ज़रूरत क्या है?

कांग्रेस का व्यंग्य- क्या BMW के लिए बना था लोकपाल?

कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने भी ट्वीट कर तंज कसा, लोकपाल का विचार 1960 में आया था। क्या तब किसी ने सोचा था कि एक दिन ये संस्था BMW में घूमेगी?जिस संस्था से जनता ने ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद की थी, वही अब शाही सवारी के लिए खबरों में है। किरण बेदी, खेमका और विपक्ष सबका एक ही सवाल हैभ्रष्टाचार के खिलाफ बनी संस्था को, क्या इतनी महंगी गाड़ियों की जरूरत है?

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