— कालपी कूच कर रानी लक्ष्मी बाई की घेराबंदी करने निकली फिरंगी सेना से 13 दिन तक क्रान्तिकारी टुकड़ी लेती रही थी मोर्चा — अंग्रेजी सेना से लेते हुए 81 क्रान्तिकारियों ने दी थी अपने प्राणों की आहुति, पांच सगे भाई भी शहादत में रहे थे शामिल — सगे भाईयों की शहादत में बनाई गई थी समाधि स्थल आज भी क्रान्तिकारियों के लोहा लेने की बयां करता है दास्तां सुनील कुमार औरैया, 19 मई (हि.स.)। भारत को ब्रिटिश शासन की दास्तां से मुक्त कराने लिए हुए संघर्ष में जनपद औरैया का स्थान अग्रणी रहा है। यहां के हजारों युवाओं ने आजादी की बलिवेदी पर अपने प्राणोत्सर्ग कर जनपद का नाम आजादी के इतिहास में सुनहरे पन्नों में दर्ज करवाया। इसी गौरवमयी बलिदान गाथा का मई महीना प्रतीक है, जब अंग्रेजी सरकार को यह पता चला कि रानी लक्ष्मी बाई कालपी में है और उन्हें पकड़ने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने जाल बुना। इस जाल में ढाल बनकर औरैया के क्रांतिकारी सेना चट्टान की तरह सामने खड़ी हो गई और तोपों के साथ अंग्रेजी सेना को तिल भर भी आगे बढ़ने नहीं दिया। यह बात ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से बात करते हुए प्ररेणा मंच के अध्यक्ष, भूतपूर्व सैनिक व इतिहास के जानकार अविनाश अग्निहोत्री ने खास बातचीत करते हुई बताई। उन्होंने बताया कि, बात उस समय की है जब प्रथम स्वाधीनता संग्राम की महानायिका वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के हाथों से ‘भीषण युद्ध करते हुए और एक तोपची की गद्दारी के कारण’ झांसी निकल कर अंग्रेजी शासन के आधीन चली गयी। झांसी का मोर्चा टूटने के बाद रानी लक्ष्मी बाई ने आजादी के संघर्ष को जारी रखने के लिए अपनी वफादार सैन्य टुकड़ी के साथ कालपी का रुख किया। कालपी पहुंचकर उन्होंने कालपी के शासक राव साहब के साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक बड़े युद्ध की योजना बनायी। उनकी इस योजना में बांदा के नवाब और भेदक जालौन के राजा परीक्षत सहित कई देश भक्त राजा अपनी-अपनी सैन्य टुकड़ियों के साथ शामिल हो गये। इस प्रकार रानी लक्ष्मी बाई ने अपनी सूझबूझ से अंग्रेजों के खिलाफ बड़े सैन्य दल का निमार्ण कर लिया। अग्रेंजों को जब रानी लक्ष्मीबाई के कालपी में होने और उनके द्वारा बड़े सैन्य दल का गठन करने का पता चला तो उन्होंने कालपी को युद्ध का मुख्य मोर्चा मानकर अपनी तैयारियां शुरू कर दी। अंग्रेजी सेना ने कालपी कूच करने के लिए यमुना का रास्ता अपनाया था प्ररेणा मंच के अध्यक्ष ने बताया कि, गोरी सरकार को जब पता चला कि झांसी की रानी कालपी में है तो उन्हें घेरने की तैयारी बनाई गई। अग्रेंजों ने कानपुर, ग्वालियर सहित कई जगहों से भारी तोपों के ब्रिटिश सेना मंगाकर कालपी के आसपास डेरा डाल लिया। इसी क्रम में तत्कालीन इटावा के कलेक्टर एओ ह्यूम को उच्च अधिकारियों का आदेश मिला कि वह भी इटावा में रह रही ब्रिटिश सेना को लेकर कालपी पहुंचे। एओ ह्यूम ने कर्नल रिडिल के नेतृत्व में तोपों से लैस विशाल सेना के साथ नौ मई 1858 को इटावा से कालपी के लिए कूच कर दिया। 10 मई को चकरनगर यमुना के डिभौली घाट पहुंचकर ह्यूम ने कालपी जाने के लिए बड़ी-बड़ी नावों की व्यवस्था करके यमुना के जलीय मार्ग का चयन किया। क्रांतिकारियों ने ली थी कसम, ब्रिटिश सेना को आगे नहीं बढ़ने देंगे प्ररेणा मंच के अध्यक्ष अविनाश अग्निहोत्री ने बताया कि, जब इटावा से ब्रिटिश सेना के कालपी जाने की खबर स्थानीय क्रान्तिकारी दल को लगी तो उन्होंने कसम खाई कि अपने जीते-जी वह ब्रिटिश सेना को कालपी पहुंच कर रानी लक्ष्मी बाई के विरुद्ध युद्ध में हिस्सा नहीं लेने देंगे। एओ ह्यूम क्रान्तिकारियों की योजना से अनभिज्ञ तीव्रगति से तोपों से युक्त नावों के द्वारा अपनी सेना के साथ कालपी की तरफ कूच करके 12 मई 1858 को औरैया के बीझलपुर घाट पर पहुंचा। यहां पहले से ही यमुना के दोनों किनारों पर घात लगायें क्रान्तिकारियों ने फिरंगी सेना पर हमला बोल दिया। भीषण युद्ध शुरू हो गया। 12 मई से लेकर 15 मई तक मुठ्ठी भर क्रान्तिकारी देश की आजादी के खातिर विशाल ब्रिटिश सेना से टक्कर लेते रहें। पीछे से हमले के बावजूद क्रांतिकारियों रणबाकुरों ने नहीं मानी थी हार बताया कि, यमुना के बीझलपुर घाट पर क्रान्तिकारियों से घिरी फिरंगी सेना को लोहे के चने चबाने में मजबूर कर दिया। जब कर्नल रिडिल को आभास हो गया कि क्रान्तिकारियों का मोर्चा टूटना कठिन है तो उसने जालौन और इटावा से जमीनी मार्ग से अतिरिक्त सेना मंगाकर पीछे से क्रान्तिकारी दल पर हमला करवा दिया। पीछे से अचानक हुए हमले से क्रान्तिकारी दल चारों से तरफ घिर गया, लेकिन आजादी के दीवाने रणबाकुरों ने अन्त तक हार नहीं मानी। अंग्रेजों से वीरता से लड़ते हुए 81 क्रान्तिकारियों ने शहादत पायी। इसी के साथ क्रान्तिकारियों का बीझलपुर का मोर्चा टूट गया। पांच सगे भाईयों की हुई शहादत, आज भी है समाधि प्ररेणा मंच के अध्यक्ष ने बताया कि, फिरंगी सेना से युद्ध में एक ही परिवार के पांच सगे भाईयों ने शहादत हो गई थी। बीझलपुर में आज भी पंच भईया के नाम से इनकी समाधि बनी हुई है। बीझलपुर युद्ध के बाद एओ ह्यूम ने अपना मार्ग निष्कंटक समझ सेना को कालपी की तरफ बढ़ने का आदेश दिया। जहां उसका इससे भी बड़ी क्रान्तिकारी टोली बेसब्री से इंतजार में थी। शेरगढ़ घाट में फिरंगी सेना का क्रांतिकारियों से हुआ मुख्य मोर्चा मंच के अध्यक्ष ने बताया कि, एओ ह्यूम बीझलपुर में क्रान्तिकारियोंं की शहादत को लेकर काफी उत्साहित था लेकिन उसे क्या पता था कि क्रान्तिकारी दल का मुख्य मोर्चा शेरगढ़ घाट औरैया में उसका बेसब्री से इन्तजार कर रहा है। जैसे ही 18 मई को फिरंगी सेना शेरगढ़ घाट की तरफ पहुंची, क्रान्तिकारियों ने अपना मुख्य मोर्चा खोलते हुए धावा बोल दिया। अचानक हुए हमले से फिरंगी सेना में खलबली मच गयी थी। इस दौरान क्रान्तिकारियोंं ने वंदे मातरम उद्घोष भी लगाए थे। क्रान्तिकारियों ने बीझलपुर का लिया बदला, ह्यूम ने डायरी में नहीं किया जिक्र प्ररेणा मंच के अध्यक्ष अविनाश अग्निहोत्री ने बताया कि, भले ही एओ ह्यूम ने अपनी डायरी में इस हमले के बारे में लिखते हुए अपने थोड़े नुकसान की बात लिखी थी, लेकिन वास्तविकता हकीकत उससे अलग थी। या यूं कह सकते हैं कि क्रान्तिकारियों ने बीझलपुर में अपने साथियों की शहादत का बदला काफी हद तक शेरगढ़ घाट पर ले लिया था। ब्रिटिश सेना के मुकाबले क्रान्तिकारियों की मजबूत स्थिति के बारे में इसी बात से पता चलता है कि अंग्रेज 18 मई से लेकर 24 मई तक शेरगढ़ घाट से कालपी की तरफ एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई थी। अंग्रेजों ने मोर्चा खोलने के चलते तोपों से ध्वस्त कर दिया था गांव उधर, कालपी में 17 मई से रानी लक्ष्मी बाई और ब्रिटिश सेना के बीच भीषण युद्ध प्रारम्भ हो चुका था। कुछ गद्दार राजाओं और भारी तोपखाना के कारण आखिरकार अंग्रेजों को 23 मई को युद्ध में विजय प्राप्त हो गयी। जब रानी लक्ष्मीबाई के हारने की खबर औरैया पहुंची तो क्रान्तिकारियों ने अपना मोर्चा शेरगढ़ घाट से हटा लिया और सभी क्रान्तिकारी दल को यमुना के बीहड़ ने अपने आगोश में लेकर छिपा लिया। खिसियाहट में तोपों से गांव को करा दिया था ध्वस्त मंच के अध्यक्ष ने बताया कि, यहां पर फिरंगी सेना को आगे न बढ़ने दिए जाने से खिसियायें अंग्रेजों ने स्थानीय जनता पर अत्याचार करते हुए मां मंगला काली मन्दिर के पास बसे गांव भटपुरा को तोपों से ध्वस्त कर हमेशा के लिए वीरान करा दिया। बताया कि, आज भी इस वीरान गांव के मंगला काली मन्दिर क्षेत्र में अवशेष बिखरे पड़े हैं। कहा कि, कालपी युद्ध का परिणाम जो भी रहा हो लेकिन औरैया के रणबाकुरों ने अपने शौर्य और पौरूष से एओ ह्यूम के नेतृत्व वाली फिरंगी सेना को कालपी पहुंचकर रानी लक्ष्मी बाई के खिलाफ युद्ध में हिस्सा लेने का मंसूबा पूरा नहीं होने दिया। इस बहादुरों के लिए जिले के इस क्षेत्र को कालांतर तक जाना जाएगा। हिन्दुस्थान समाचार




