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Friday, March 6, 2026
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बांग्लादेश में घट गई हिंदुओं की संख्या, बहुत चौकाने वाले हैं आंकड़े! जानिए

अब तक इन हमलों में सैकड़ों हिंदू मारे जा चुके हैं लेकिन पुलिस-प्रशासन कुछ नहीं कर पा रहा, बल्‍कि यूनुस सरकार पिछले चार माह में पूरी तरह से विफल साबित हुई है

नई दिल्‍ली, रफ्तार डेस्‍क । बांग्लादेश में पांच अगस्त को शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद उन्हें देश छोड़ना पड़ा था, उसके बाद वहां अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ गए हैं। पिछले कुछ महीनों में इस देश में हिंदू घरों, दुकानों और मंदिरों को इस्लामिक चरमपंथी लगातार अपना निशाना बना रहे हैं। अब तक इन हमलों में सैकड़ों हिंदू मारे जा चुके हैं लेकिन पुलिस-प्रशासन कुछ नहीं कर पा रहा, बल्‍कि यूनुस सरकार पिछले चार माह में पूरी तरह से विफल साबित हुई है। यहां तक कि जब बांग्लादेशी हिंदुओं ने अपने लिए सुरक्षा मांगी तो उनके नेताओं पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं। आइए जानते हैं बांग्लादेश में हिंदुओं की वर्तमान स्थिति क्या है।

लगभग एक तिहाई आबादी पहले हिंदू 

बांग्लादेश की 2022 की जनगणना के अनुसार, देश में हिंदुओं की आबादी 7.96 प्रतिशत है। इस संबंध में एक रिपोर्ट हाल ही में सामने आई है जो यहां कि सभी आंकड़ों को प्रस्‍तुत कर रही है, दरअसल, यह रिपोर्ट तमाम शोध के आधार पर इंण्‍डिन एक्‍प्रेस द्वारा तैयार की गई है, इसके अनुसार हिन्‍दू के अतिरिक्‍त अन्य अल्पसंख्यक (बौद्ध, ईसाई, आदि) कुल मिलाकर 1 प्रतिशत से भी कम हैं। बांग्लादेश की जनसंख्या 165.16 मिलियन है। जिसमें 91.08 प्रतिशत इस्‍लाम मजहब को माननेवाले मुसलमान हैं। रिपोर्ट बताती है कि इसी बांग्‍लादेश में पहले हिंदुओं की बड़ी आबादी रहती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें काफी हद तक कमी आई है। लगभग एक तिहाई आबादी पहले हिंदू थी।

1901 के बाद हिंदुओं की संख्या कम 

 लेकिन बाद में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ती गई और हिंदुओं की जनसंख्या घटती गई। 1901 के बाद से बांग्लादेश की जनसंख्या में हिंदुओं की संख्या कम हो गई है। 1941 और 1974 की जनगणना के बीच गिरावट सबसे अधिक थी, जब बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान था। भारत विभाजन के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा। बड़ी संख्या में हिंदू बांग्लादेश छोड़कर भारत आए। मुसलमानों की कुल वैवाहिक प्रजनन दर प्रति महिला 7.6 बच्चे थी, जबकि हिंदुओं की दर 5.6 थी।

ब्रिटिश शासन में बंगाल और पंजाब दो प्रांत 

उल्‍लेखनीय है कि ब्रिटिश शासन में बंगाल और पंजाब दो प्रांत थे जो भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित थे। भारत विभाजन के वक्‍त पंजाब की तरह, 1947 में बंगाल में नई सीमा के पार जनसंख्या का कोई बड़ा आदान-प्रदान नहीं हुआ। विभाजन के बाद 11.4 मिलियन हिंदू पूर्वी बंगाल में रह गए। 1947 में, केवल 344,000 हिंदू शरणार्थी पश्चिम बंगाल पहुंचे, इस उम्मीद में कि पूर्वी पाकिस्तान में अन्‍य अल्पसंख्यक शांति से रह सकेंगे पर ऐसा हुआ नहीं है। समय बीतने के साथ बांग्‍लादेश में लगातार हिन्‍दू एवं अन्‍य अल्‍पसंख्‍यकों पर इस्‍लामिक प्रताड़ना का दौर चलता रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ है कि आज बांग्‍लादेश में जो 20 प्रतिशत से अधि‍क हिन्‍दू भारत विभाजन के समय वहां रुक गए थे, उसकी वर्तमान में संख्‍या बढ़ने के स्‍थान पर घटकर आठ प्रतिशत से भी कम हो गई है। 

भारत से अधिकांश मुस्लिम पाकिस्‍तान नहीं गए 

दूसरी तरफ भारत है जहां से मुसलमान बड़ी संख्‍या में नए बने पाकिस्‍तान में नहीं गए, बल्‍कि जिन लोगों ने पाकिस्‍तान के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाई और अपना कीमती वोट मुस्‍लि‍म लीग के समर्थन में भारत के विभाजन एवं मजहब के आधार पर यह कहते हुए दिया कि वह हिन्‍दुओं के साथ नहीं रह सकते, उनका मजहब अलग है उन्‍हें अपने लिए अलग देश चाहिए वह मुसलमान भी अधिकांश नए बने पाकिस्‍तान में नहीं गए थे, फिर भी जो भारत में मुसलमानों की जनसंख्‍या 3 करोड़ 50 लाख थी, वह 1951 में कुल जनसंख्या में मुस्लिमों का प्रतिशत 9.8 प्रतिशत हो गई। 

अल्‍पसंख्‍यकों के लिए स्‍वतंत्रता के कोई मायने नहीं 

 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत की कुल आबादी में मुस्लिमों का प्रतिशत 14.23 रहा। वहीं, आज 2024 में भारत की कुल आबादी करीब 147 करोड़ होने का अनुमान है और मुस्लिमों की आबादी करीब 20 से 25 करोड़ होने का अनुमान है। वास्‍तव में यह है इन दोनों देशों में मजहब के आधार का होने और नहीं होने का मतलब । भारत ने स्‍वतंत्रता के साथ ही अपने लिए पंथ निपरेक्ष गणराज्‍य चुना, जिसमें सभी के लिए समान अवसर मौजूद हैं, वहीं पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश ने अपने लिए इस्‍लामिक रिपब्‍लिक होना चुना है, जिसमें अल्‍पसंख्‍यकों के लिए उनकी स्‍वतंत्रता के कोई मायने नहीं हैं।

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