नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। कर्नाटक सरकार ने राज्य में बढ़ती डॉग-बाइट की घटनाओं पर बड़ा कदम उठाते हुए मुआवजे की नई व्यवस्था लागू की है। सरकारी निर्णय के मुताबिक, आवारा कुत्ते के हमले से मौत होने पर पीड़ित परिवार को ₹5 लाख दिए जाएंगे, जबकि गंभीर चोट लगने की स्थिति में ₹5,000 की सहायता राशि दी जाएगी। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवारा कुत्तों पर कड़े कदम उठाने के आदेश जारी किए हैं।
SC ने बताया गंभीर संकट
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के हमलों को “गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा संकट” बताते हुए सभी राज्यों को तुरंत कार्रवाई का आदेश दिया है। जिसमें इन सभी सार्वजनिक स्थानों से कुत्ते हटाए जाएं। स्कूल,कॉलेज,अस्पताल, खेल परिसर,बस स्टैंड,रेलवे स्टेशन। कोर्ट के अनुसार, इन स्थानों पर आवारा कुत्तों की मौजूदगी किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं।
पकड़े गए कुत्ते वापस सड़क पर नहीं छोड़े जाएंगे
नसबंदी और टीकाकरण के बाद भी कुत्ते वहीँ की जगह पर वापस नहीं छोड़े जाएंगे। उन्हें निर्धारित डॉग शेल्टरों में ही रखा जाएगा। संबंधित संस्थान यह सुनिश्चित करेंगे कि मजबूत घेरेबंदी के कारण कुत्ते सार्वजनिक जगहों में दोबारा प्रवेश न करें। आदेश न मानने पर अधिकारियों पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होगी।
तमिलनाडु के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने भी बढ़ते डॉग-बाइट मामलों को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने खुलासा किया कि, तमिलनाडु में इस वर्ष 5.25 लाख कुत्ते काटने के मामले सामने आए।
रेबीज से 28 लोगों की मौत हो चुकी है
चिदंबरम ने डॉग लवर्स से अपील करते हुए कहा कि,सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानव सुरक्षा के लिए आवश्यक है और इसमें कहीं भी कुत्तों को नुकसान पहुंचाने की बात नहीं है।
सार्वजनिक सुरक्षा पर सरकार और कोर्ट दोनों सख्त
सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और कर्नाटक सरकार के फैसले से साफ है कि आने वाले दिनों में आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों में सख्ती और व्यवस्था दोनों देखने को मिलेंगी। सरकार का उद्देश्य है कि सड़क पर आम लोगोंखासकर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
आवारा कुत्तों की आबादी पर ABC कार्यक्रम की प्रभावशीलता
आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने में एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) कार्यक्रम की प्रभावशीलता एक व्यापक रूप से चर्चा का विषय है। जिसे अक्सर नसबंदी और टीकाकरण (ABC-ARV) कार्यक्रम कहा जाता है, मानवीय और वैज्ञानिक तरीका है। इसकी सफलता दर, हालांकि, इसे लागू करने के तरीके पर निर्भर करती है। ABC कार्यक्रम केवल तभी प्रभावी होता है जब यह एक बड़े पैमाने पर और तेज गति से लागू किया जाता है।जनसंख्या का लक्ष्य: अध्ययनों से पता चला है कि आवारा कुत्तों की आबादी में महत्वपूर्ण कमी देखने के लिए, एक विशिष्ट क्षेत्र की कम से कम 70% से 80% कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण एक साथ करना आवश्यक है।
यदि यह लक्ष्य तेज़ी से (आमतौर पर 3 से 5 वर्षों के भीतर) प्राप्त नहीं किया जाता है, तो कुत्तों की प्रजनन दर नसबंदी की दर से अधिक हो सकती है, जिससे कार्यक्रम अप्रभावी हो जाता है।
प्रभावशीलता के प्रमाण
सफल ABC कार्यक्रमों वाले शहरों में, आवारा कुत्तों की आबादी और कुत्ते के काटने के मामलों में स्थायी कमी देखी गई है। ABC के साथ एंटी-रेबीज टीकाकरण (ARV) को मिलाने पर रेबीज को नियंत्रित करने में जबरदस्त सफलता मिलती है। रेबीज की बीमारी को खत्म करने के लिए मास वैक्सीनेशन सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।यह तरीका क्रूरता-विरोधी कानूनों (Anti-Cruelty Laws) का पालन करता है और अंतर्राष्ट्रीय पशु कल्याण मानदंडों के अनुरूप है, जो कुत्तों को मारने (Culling) के तरीके से अधिक टिकाऊ और नैतिक है।
चुनौतियाँ और विफलता के कारण
ABC कार्यक्रम अक्सर विफल हो जाता है या धीमी गति से चलता है, जिसके मुख्य कारण हैंयदि नसबंदी दर 50% से कम रहती है, तो आबादी पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। यदि नसबंदी वाले क्षेत्रों में बाहर से बिना नसबंदी वाले कुत्ते प्रवेश कर जाते हैं, तो आबादी फिर से बढ़ जाती है।प्रशिक्षित पशु चिकित्सकों, पर्याप्त ऑपरेशन थिएटर, और कुत्ता पकड़ने की प्रभावी प्रणालियों के लिए पर्याप्त धन की कमी होना। कुत्तों की आबादी, नसबंदी की स्थिति और काटने की घटनाओं पर सटीक डेटा की कमी होना, जिससे कार्यक्रम की योजना और निगरानी मुश्किल हो जाती है।
ABC कार्यक्रम, जब वैज्ञानिक तरीके, उच्च कवरेज और जन जागरूकता के साथ सख्ती से लागू किया जाता है, तो यह आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने और रेबीज उन्मूलन का सबसे सफल और मानवीय तरीका है।




