नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। वृंदावन स्थित प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन और मंदिर फंड के उपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मंदिर कमेटी से तीखे सवाल पूछे। कोर्ट ने कहा कि मंदिर भले ही निजी हो, लेकिन भगवान तो सबके हैं। फिर मंदिर का फंड केवल एक कमेटी के हाथ में क्यों रहे? क्या श्रद्धालुओं की सुविधा और विकास के लिए इसका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए?
क्या है मामला?
बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर 15 मई 2024 को दिए गए उस आदेश का विरोध किया, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार को मंदिर फंड का उपयोग मंदिर कॉरिडोर निर्माण में करने की अनुमति दी गई थी। कमेटी का कहना है कि उन्हें बिना सुने ही सुप्रीम कोर्ट से यह आदेश निकल गया, जो न सिर्फ अनुचित है, बल्कि मंदिर की स्वायत्तता पर भी सवाल खड़ा करता है।
कोर्ट ने मंदिर कमेटी से क्या पूछा?
जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने पूछा,“आप क्यों चाहते हैं कि सारा फंड आपकी पॉकेट में जाए? मंदिर निजी हो सकता है, लेकिन देवता और श्रद्धालु सबके हैं। मंदिर के फंड का उपयोग आम लोगों की सुविधा के लिए क्यों नहीं किया जा सकता? कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि मंदिर कमेटी को राज्य सरकार के अध्यादेश से आपत्ति है, तो उन्हें पहले हाई कोर्ट जाना चाहिए था।
मंदिर कमेटी का पक्ष?
मंदिर की ओर से सीनियर वकील श्याम दीवान ने दलील दी कि बांके बिहारी मंदिर एक निजी ट्रस्ट के तहत संचालित होता है और यह सदियों से गोस्वामी परिवार द्वारा चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जबरन दखल दिया और बिना अधिकार मंदिर की संपत्ति में हस्तक्षेप कर रही है। उन्होंने यह भी कहा,“सरकार चाहे तो जमीन अधिग्रहण करके कॉरिडोर बनाए, लेकिन मंदिर का फंड क्यों ले रही है? करीब 50 मिनट चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि 15 मई को दिया गया आदेश वापस लिया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर के प्रबंधन की निगरानी के लिए सेवानिवृत्त हाई कोर्ट जज की अध्यक्षता में एक नई प्रबंधन कमेटी बनाई जा सकती है, जिसमें जिलाधिकारी और ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग) के प्रतिनिधि को भी शामिल किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि बांके बिहारी जैसे धार्मिक स्थलों का विकास जरूरी है ताकि धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिले। इसके लिए मंदिर परिसर और उसके आसपास जरूरी सुविधाओं का निर्माण किया जाना चाहिए। श्रद्धालुओं की भीड़, अव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े मामलों को देखते हुए सरकार का दखल जरूरी है। बांके बिहारी मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक है। सुप्रीम कोर्ट का रुख यह साफ करता है कि मंदिर प्रबंधन पारदर्शी होना चाहिए और भक्तों के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।




